खगड़िया। शहर में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई का शोर खूब सुनाई देता है, लेकिन सड़क पर तस्वीर कुछ और ही कहानी कह रही है। राजेंद्र चौक से बखरी बस स्टैंड रोड तक सड़क का बड़ा हिस्सा फिर से दुकानों, ठेलों और खोमचों के कब्जे में है। नतीजा—40 फीट की सड़क कई जगह महज 10 फीट की होकर रह गई है।

सड़क पर फल-सब्जी के ठेले हैं, खोमचे हैं, ऑटो-ई-रिक्शा हैं और इनके बीच निकलने के लिए वाहन चालक तथा पैदल राहगीर जूझते नजर आते हैं। सड़क किनारे बने पैदल रास्ते तक अतिक्रमण की चपेट में हैं।
कार्रवाई होती है, फिर कब्जा लौट आता है
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब प्रशासन बार-बार अतिक्रमण हटाता है तो फिर सड़क पर वही दुकानें दोबारा कैसे सज जाती हैं? कार्रवाई के दौरान सड़क खाली होती है। प्रशासन अपनी कार्रवाई की तस्वीरें जारी करता है। कुछ दिन तक व्यवस्था दिखाई देती है और फिर धीरे-धीरे ठेले और दुकानें उसी जगह लौट आती हैं।
यानी अतिक्रमण हटाने का अभियान स्थायी समाधान के बजाय कुछ दिनों की कवायद बनकर रह गया है।
जाम छुड़ाने में पुलिस परेशान, असली समस्या सड़क पर ही
ट्रैफिक व्यवस्था संभालने के लिए पुलिस जवानों की तैनाती है। लेकिन जब सड़क का बड़ा हिस्सा ही दुकानों और वाहनों से घिरा हो तो जवान भी आखिर कितना यातायात संभालेंगे? एक तरफ ठेले और दुकानें, दूसरी तरफ ऑटो-ई-रिक्शा और बाइक—बीच में फंसा आम आदमी।
राजेंद्र चौक से लेकर आरओबी पुल की ओर जाने वाले रास्ते में भीड़ बढ़ते ही जाम की स्थिति बन जाती है। लोगों का समय बर्बाद होता है और वाहन रेंगते नजर आते हैं।
फुटकर दुकानदारों के लिए व्यवस्था क्यों नहीं?
फुटकर विक्रेताओं के सामने भी रोजी-रोटी का सवाल है। लेकिन इसका समाधान सड़क को बाजार में बदल देना नहीं हो सकता। प्रशासन को ऐसे दुकानदारों के लिए व्यवस्थित वेंडिंग जोन उपलब्ध कराने के साथ मुख्य सड़क और पैदल मार्ग को अतिक्रमण मुक्त रखना होगा।

‘किराया’ और ‘चढ़ावे’ की चर्चा, जांच जरूरी
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि कुछ फुटकर दुकानदार सड़क किनारे जगह के लिए नियमित किराया देते हैं। कुछ दुकानदारों ने भी किराया देने की बात कही है। वहीं, रोजाना ‘चढ़ावा’ दिए जाने की चर्चा भी है। हालांकि, इस कथित लेन-देन के समर्थन में अभी कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया है। इसलिए इस दावे को तथ्य नहीं बल्कि जांच की जरूरत वाले आरोप/चर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सवाल सीधा है—अतिक्रमण हटता है या सिर्फ सुर्खियां बनती हैं?
शहर के लोगों का सवाल प्रशासन से है। अगर सड़क खाली कराने की कार्रवाई के बाद भी कुछ ही दिनों में फिर वही स्थिति बन जाती है, तो कार्रवाई का असर आखिर कितने दिन रहता है?
कौन तय करेगा कि सड़क पर दुकान कहां लगेगी?
कौन सुनिश्चित करेगा कि पैदल रास्ता खाली रहे?
और बार-बार कब्जा लौटने की जिम्मेदारी किसकी होगी?
फिलहाल राजेंद्र चौक से बखरी बस स्टैंड तक की तस्वीरें साफ संदेश दे रही हैं—सड़क जनता के चलने के लिए है या सड़क पर बाजार लगाने के लिए?

