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कांग्रेस खुद खोद रही अपनी राजनीतिक कब्र, मोदी सरकार के विकास ने बदल दिया देश का मूड

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वंदे मातरम् पर रुख से फिर घिरी कांग्रेस; जनता पूछ रही—विरोध के अलावा विपक्ष के पास विकल्प क्या है?

अभिजीत सिन्हा, प्रधान संपादक, एनबी18, बिहार

कांग्रेस को आखिर कब समझ आएगा कि भारत बदल चुका है? लगातार चुनावी पराजयों के बावजूद यदि कांग्रेस का नेतृत्व यह समझने को तैयार नहीं है कि देश का मतदाता अब केवल नारों और सरकार विरोधी राजनीति से प्रभावित नहीं होता, तो यह कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल है। वंदे मातरम् पर कांग्रेस का मौजूदा रुख इसी भूल की एक और मिसाल बनता दिखाई दे रहा है।

कांग्रेस ने अपने ऐतिहासिक निर्णय का हवाला देते हुए पार्टी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् की पहली दो कड़ियों के गायन की परंपरा कायम रखने का फैसला किया है। कांग्रेस इसे ऐतिहासिक संदर्भ में सही ठहरा सकती है, लेकिन राजनीतिक सवाल यह है कि क्या आज के भारत की भावनाओं को समझते हुए ऐसा फैसला कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से समझदारी भरा है?

वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक रहा है। ऐसे विषय पर कांग्रेस का रुख स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस का मुद्दा बनेगा। भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का मौका मिलेगा और कांग्रेस फिर अपने फैसले की सफाई देती दिखाई देगी। यही तो कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या है।

पार्टी मुद्दा उठाती है, लेकिन चर्चा उसके पक्ष में नहीं बल्कि उसके खिलाफ शुरू हो जाती है।

कांग्रेस को भाजपा से नहीं, अपनी राजनीतिक रणनीति से खतरा

आज कांग्रेस को गंभीरता से यह सवाल खुद से पूछना चाहिए कि आखिर बार-बार चुनावी नुकसान के बाद भी उसकी रणनीति क्यों नहीं बदल रही?

सरकार की आलोचना विपक्ष का अधिकार है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष जरूरी है। लेकिन विपक्ष की राजनीति का मतलब केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा का विरोध नहीं हो सकता।

जनता पूछती है—अगर आप सत्ता में आए तो करेंगे क्या?

यही वह सवाल है जिसका जवाब कांग्रेस को मजबूती से देना होगा।

देश में पिछले वर्षों में बड़े बदलाव हुए हैं। हाईवे और एक्सप्रेसवे का विस्तार, रेलवे विद्युतीकरण, नए हवाई अड्डे, डिजिटल भुगतान, UPI, जनधन खातों का विस्तार, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, बिजली और ग्रामीण बुनियादी ढांचे में सुधार जैसे कदमों ने आम नागरिक और अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित किया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014 में देश में 74 परिचालन हवाई अड्डे थे, जो 2026 में बढ़कर 165 हो गए। ब्रॉडगेज रेल नेटवर्क का लगभग 99.6 प्रतिशत विद्युतीकरण भी हो चुका है।

UPI तो भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की पहचान बन चुका है। मार्च 2026 में UPI पर करीब 2,264 करोड़ लेन-देन हुए, जिनका मूल्य लगभग ₹29.53 लाख करोड़ रहा।

इन उपलब्धियों को केवल इसलिए नकार देना कि वे मोदी सरकार के कार्यकाल में हुईं, विपक्ष की राजनीति को मजबूत नहीं करेगा।

मोदी सरकार की उपलब्धियों से मुकाबला करना है तो उससे बेहतर मॉडल दीजिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पिछले वर्षों में बुनियादी ढांचे और डिजिटल अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में महत्वपूर्ण विस्तार देखा है। भारत की अर्थव्यवस्था का आकार भी काफी बढ़ा है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 में भारत की नाममात्र GDP लगभग ₹106.57 लाख करोड़ थी, जो 2024-25 में लगभग ₹331.03 लाख करोड़ तक पहुंची।

इसका मतलब यह नहीं कि देश की सारी समस्याएं खत्म हो गईं।

बेरोजगारी है। महंगाई चिंता का विषय है। किसानों की आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और असमानता जैसे सवाल आज भी मौजूद हैं।

इन सवालों पर सरकार को जवाब देना चाहिए और विपक्ष को सवाल पूछने चाहिए।

लेकिन सवाल पूछने और देश की हर उपलब्धि को नकारने में अंतर है।

अगर कांग्रेस को मोदी सरकार से मुकाबला करना है, तो उसे यह बताना होगा कि वह इन उपलब्धियों को आगे कैसे ले जाएगी और कहां बेहतर करेगी। यही रचनात्मक विपक्ष है।

राहुल गांधी: कांग्रेस की ताकत या सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी?

अब बात राहुल गांधी की।

राहुल गांधी कांग्रेस के प्रमुख राष्ट्रीय चेहरों में हैं। वह सरकार पर सवाल उठाते हैं, मुद्दे उठाते हैं और विपक्ष की राजनीति को आक्रामक बनाने की कोशिश करते हैं।

लेकिन कांग्रेस को एक असहज सवाल पूछना ही होगा—

क्या राहुल गांधी के बयान कांग्रेस को चुनावी फायदा पहुंचा रहे हैं?

क्योंकि कई मौकों पर ऐसा हुआ है कि कांग्रेस का मूल मुद्दा पीछे छूट गया और राहुल गांधी के बयान पर राजनीतिक बहस शुरू हो गई।

राजनीति में आक्रामकता जरूरी है, लेकिन आक्रामकता और राजनीतिक प्रभाव एक ही चीज नहीं हैं।

यदि बयान पार्टी के पक्ष में जनसमर्थन पैदा करने के बजाय लगातार विवाद पैदा कर रहे हैं, तो नेतृत्व को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए।

कांग्रेस को यह भी देखना होगा कि उसके पास राहुल गांधी के अलावा ऐसा कौन सा व्यापक राष्ट्रीय नेतृत्व है, जो अलग-अलग वर्गों और राज्यों के मतदाताओं को एक साथ जोड़ सके।

क्षेत्रीय दलों के लिए भी कांग्रेस की चुनौती

कांग्रेस की कमजोरी का असर विपक्षी गठबंधन की राजनीति पर भी पड़ेगा।

क्षेत्रीय दल अपने राज्यों की राजनीति और मतदाता की भावना को बहुत करीब से समझते हैं। वे जानते हैं कि किस मुद्दे पर जनता उनके साथ है और किस मुद्दे पर उनसे दूरी बना सकती है।

अगर कांग्रेस ऐसे मुद्दों पर आगे बढ़ती है जो सहयोगी दलों के लिए राजनीतिक परेशानी पैदा करते हैं, तो आने वाले चुनावों में क्षेत्रीय दल भी उससे दूरी बनाने पर मजबूर हो सकते हैं।

गठबंधन केवल नेताओं की बैठक से नहीं बनता। गठबंधन जनता की स्वीकार्यता से बनता है।

कांग्रेस को यह बात समझनी होगी।

मोदी सरकार से असहमति लोकतंत्र है, लेकिन उपलब्धियों से इनकार राजनीति नहीं

यह भी साफ होना चाहिए कि मोदी सरकार की उपलब्धियों की चर्चा का अर्थ सरकार को सवालों से मुक्त करना नहीं है।

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछे जाने चाहिए।

सरकार से पूछा जाना चाहिए कि युवाओं को पर्याप्त रोजगार क्यों नहीं मिल रहा।

महंगाई पर राहत कैसे मिलेगी।

किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान क्या है।

सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंच रहा है।

जहां भ्रष्टाचार या प्रशासनिक विफलता है, वहां जवाबदेही कौन तय करेगा।

लेकिन जहां काम हुआ है, वहां काम को स्वीकार करना भी ईमानदार राजनीति है।

यही बात कांग्रेस को समझनी होगी।

कांग्रेस के सामने आखिरी मौका नहीं, लेकिन बड़ा मौका जरूर है

कांग्रेस के पास अभी भी देश की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने का अवसर है। उसके पास संगठन है, इतिहास है, देशभर में कार्यकर्ता हैं और कई राज्यों में मजबूत राजनीतिक आधार भी है।

लेकिन केवल इतिहास के सहारे भविष्य की राजनीति नहीं जीती जा सकती।

कांग्रेस को नया राजनीतिक नैरेटिव बनाना होगा।

उसे यह बताना होगा कि नया भारत कैसा होगा, अर्थव्यवस्था कैसी होगी, युवाओं के लिए क्या होगा, किसानों के लिए क्या होगा और दुनिया में भारत की भूमिका को वह किस तरह आगे बढ़ाएगी।

सिर्फ मोदी हटाओ की राजनीति अब पर्याप्त नहीं होगी।

मोदी सरकार को हराने का सपना देखने से पहले कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि वह मोदी सरकार के बाद देश को बेहतर विकल्प दे सकती है।

और यही कांग्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा है।

क्योंकि जनता अब केवल यह नहीं पूछती कि “मोदी क्यों नहीं?”

जनता पूछती है—“फिर कौन और क्यों?”

अगर कांग्रेस इस सवाल का मजबूत, विश्वसनीय और देश की आकांक्षाओं से जुड़ा जवाब नहीं दे पाती, तो चुनावी हार के बाद हार केवल संयोग नहीं रह जाएगी।

वह कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति का परिणाम होगी।

और तब यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस की राजनीतिक जमीन उसके विरोधियों ने नहीं, बल्कि उसकी अपनी गलतियों ने खोदी है।

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