राजेंद्र चौक पर ट्रैफिक पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल; अतिक्रमण हटाना जरूरी तो गरीब के सामान को नुकसान पहुंचाना क्यों? बार-बार कब्जा लौटता है तो स्थायी समाधान कब?
खगड़िया। शहर में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, लेकिन क्या सड़क खाली कराने के नाम पर गरीब की रोजी-रोटी भी कुचल दी जाएगी? शनिवार सुबह राजेंद्र चौक पर अतिक्रमण हटाने के दौरान एनबी18 के कैमरे में कैद तस्वीरों ने ट्रैफिक पुलिस की कार्रवाई पर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। कार्रवाई के दौरान सब्जी बेचने वाले ठेलेवालों का सामान सड़क पर फेंका गया और उनकी टोकरियां पैरों तले कुचली गईं। सवाल सीधा है—अतिक्रमण हटाने का अधिकार दिया, लेकिन मेहनत की कमाई से खरीदे सामान को नुकसान पहुंचाने का हक किसने दिया?
राजेंद्र चौक से बखरी बस स्टैंड तक अतिक्रमण का खेल पुराना है। सड़क किनारे ठेले, दुकानें और सामान फैलने से यातायात प्रभावित होता है। जाम की स्थिति बनती है और राहगीरों को परेशानी होती है। प्रशासन समय-समय पर अभियान चलाकर सड़क खाली कराता है। कुछ दिन स्थिति सुधरती है और फिर सड़क पर वही कब्जे दिखाई देने लगते हैं।
यहीं से प्रशासन की कार्रवाई पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। अगर हर कुछ दिन बाद अतिक्रमण हटाना पड़ रहा है और उसके बाद फिर वही स्थिति बन रही है तो आखिर स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला जा रहा? क्या प्रशासन सिर्फ अभियान चलाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रहा है?
पुलिस की मौजूदगी के बावजूद दोबारा अतिक्रमण कैसे?
राजेंद्र चौक शहर का प्रमुख यातायात क्षेत्र है। यहां पुलिस और ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी रहती है। इसके बावजूद सड़क किनारे बार-बार अतिक्रमण होता है। ऐसे में सवाल यह है कि अतिक्रमण हटाने के बाद दोबारा कब्जा रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?
कार्रवाई पर सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि मामला गरीब ठेलेवालों का है। सब्जी का ठेला लगाने वाला व्यक्ति अपनी सीमित पूंजी से रोज सामान खरीदता है और उसी की बिक्री से परिवार चलाता है। अतिक्रमण होने पर उसे हटाया जाना एक अलग विषय है, लेकिन उसके सामान को सड़क पर फेंकना और टोकरी को नुकसान पहुंचाना क्या कार्रवाई का अनिवार्य हिस्सा है?
कानून सबके लिए है तो कार्रवाई भी एक समान होनी चाहिए
सड़क पर अतिक्रमण करने वाला चाहे छोटा ठेलेवाला हो या बड़ा कारोबारी, यातायात बाधित होने पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन कार्रवाई की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे कानून भी लागू हो और किसी की मेहनत की पूंजी अनावश्यक रूप से बर्बाद भी न हो।
एनबी18 के कैमरे में कैद तस्वीरें अब प्रशासन से जवाब मांग रही
अतिक्रमण हटाना है तो पूरी मजबूती से हटाइए। सड़क को स्थायी रूप से अतिक्रमण मुक्त रखिए। लेकिन सवाल यह है कि गरीब की टोकरी कुचलकर कार्रवाई दिखाने के बजाय अतिक्रमण दोबारा न हो, इसकी व्यवस्था कब होगी?
सवाल सिर्फ शनिवार की कार्रवाई का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें अतिक्रमण हटता है, फिर लौटता है और फिर अभियान चलता है। आखिर इस पूरे चक्र की जवाबदेही किसकी है?
एनबी18 का सवाल—सड़क खाली कराने का अधिकार प्रशासन को है, लेकिन गरीब की रोजी-रोटी नुकसान करने की जवाबदेही कौन लेगा?

