✍️ अभिजीत सिन्हा
प्रबंध/प्रधान संपादक, NB18
खगड़िया में नए पुलिस अधीक्षक आईपीएस भानु प्रताप सिंह के पदभार संभालने के बाद पुलिस की सक्रियता में उल्लेखनीय तेजी दिखाई दे रही है। पिछले कुछ दिनों में जारी प्रेस विज्ञप्तियां बताती हैं कि पुलिस ने अपराधियों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया है। ₹25 हजार के दो इनामी अपराधियों की गिरफ्तारी, बेलदौर थाना के टॉप-10 अपराधी की गिरफ्तारी, महेशखूंट क्षेत्र के कुख्यात अपराधियों पर कार्रवाई, बिहार पुलिस रेडियो ऑपरेटर भर्ती परीक्षा के कथित सॉल्वर गैंग का भंडाफोड़ कर 15 आरोपियों की गिरफ्तारी, गंगौर थाना क्षेत्र से 144 जिंदा कारतूस और ₹95,200 नकद की बरामदगी, मुफ्फसिल थाना क्षेत्र में चार अवैध मिनी गन फैक्ट्रियों का उद्भेदन, वाहन चोर गिरोह के विरुद्ध कार्रवाई तथा अपहृताओं की सकुशल बरामदगी जैसी उपलब्धियां पुलिस की सक्रियता का संकेत देती हैं।
दैनिक कार्रवाई के आंकड़े भी इसी दिशा की पुष्टि करते हैं। एक दिन में 34 गिरफ्तारियां, 11 आत्मसमर्पण, 12 BW/NBW/कुर्की-इश्तेहार का निष्पादन और 445 वाहनों की जांच दर्ज की गई। एक अन्य दिन 24 गिरफ्तारियां, 3 आत्मसमर्पण, 25 वारंट/कुर्की/इश्तेहार का निष्पादन तथा 435 वाहनों की जांच की गई। यह स्पष्ट करता है कि जिला पुलिस ने वारंट निष्पादन और फरार अपराधियों के खिलाफ अभियान को तेज किया है।
इन उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता। अपराध नियंत्रण के लिए ऐसी कार्रवाई आवश्यक भी है। लेकिन खगड़िया की असली परीक्षा केवल गिरफ्तारी के आंकड़ों से पूरी नहीं होगी।
वर्षों से जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई मामलों में अनुसंधान की गुणवत्ता, शिकायतों के निस्तारण और निष्पक्षता पर आरोप लगे। इन आरोपों का अंतिम निष्कर्ष न्यायालय और विधिसम्मत जांच से ही निकलेगा, लेकिन यह भी सच है कि ऐसी शिकायतों ने पुलिस और जनता के बीच भरोसे को प्रभावित किया है।
यही वजह है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का असर केवल अपराधियों पर नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था के भीतर भी दिखाई देना चाहिए। जिन थानों की कार्यशैली लंबे समय से विवादों में रही है, उनकी प्रशासनिक समीक्षा हो। जिन अधिकारियों के विरुद्ध गंभीर और सत्यापन योग्य शिकायतें हैं, उनकी निष्पक्ष जांच हो। आवश्यकता हो तो थाना स्तर पर व्यापक फेरबदल भी किया जाए।
एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की सबसे बड़ी ताकत ईमानदार पुलिस व्यवस्था होती है। यदि कुछ लोगों की कार्यशैली पूरी पुलिस की छवि को नुकसान पहुंचाती है, तो उसका खामियाजा उन पुलिसकर्मियों को भी भुगतना पड़ता है जो पूरी निष्ठा और ईमानदारी से काम कर रहे हैं।
खगड़िया की जनता केवल यह नहीं देखना चाहती कि कितने अपराधी पकड़े गए। वह यह भी देखना चाहती है कि हर पीड़ित की शिकायत निष्पक्षता से सुनी जाए, अनुसंधान साक्ष्यों के आधार पर हो, निर्दोष को अनावश्यक कानूनी कार्रवाई का सामना न करना पड़े और प्रभावशाली अपराधी भी कानून से बच न सकें।
आईपीएस भानु प्रताप सिंह के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। शुरुआती कार्रवाई ने एक सकारात्मक संदेश दिया है। अब यदि अपराध नियंत्रण के साथ पुलिस तंत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता को भी समान प्राथमिकता दी जाती है, तो यह केवल पुलिस की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि खगड़िया में कानून के राज पर जनता के भरोसे की वास्तविक पुनर्स्थापना होगी।
खगड़िया को सिर्फ ‘ऑपरेशन क्राइम’ नहीं, बल्कि ‘ऑपरेशन ट्रस्ट’ की भी जरूरत है। यही बदलाव इस अभियान को स्थायी सफलता दिला सकता है।

