पटना | NB18 विशेष
मिथिलांचल के हजारों गन्ना किसानों के लिए वर्षों से एक सवाल था—क्या कभी सकरी और रैयाम की चीनी मिलें फिर से चलेंगी? अब इस सवाल का जवाब सरकार की नई घोषणा के साथ उम्मीद में बदलता दिखाई दे रहा है। सरकार ने 20 नवंबर को दोनों परियोजनाओं के शिलान्यास का कार्यक्रम तय किया है। यदि यह योजना तय समय पर आगे बढ़ती है, तो इसका असर सिर्फ चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे इलाके की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
दरअसल, जिन इलाकों में कभी गन्ने की खेती किसानों की मुख्य पहचान थी, वहीं मिलें बंद होने के बाद खेती का रकबा लगातार घटता गया। किसानों को अपनी उपज दूर-दराज की मिलों तक ले जानी पड़ी या फिर कई लोगों ने गन्ने की खेती छोड़कर दूसरी फसलों का रुख कर लिया। ऐसे में नई चीनी मिलों की पहल को किसान एक नए अवसर के रूप में देख रहे हैं।
सरकार का कहना है कि इन परियोजनाओं को आधुनिक तकनीक के अनुरूप विकसित किया जाएगा। इसका उद्देश्य केवल चीनी बनाना नहीं, बल्कि कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर स्थानीय स्तर पर रोजगार और निवेश के अवसर तैयार करना भी है। इससे आसपास के बाजार, परिवहन और छोटे कारोबारों को भी गति मिलने की संभावना है।
हालांकि, शिलान्यास के साथ ही लोगों की उम्मीदों के बीच कुछ सवाल भी खड़े हैं। पिछली कई घोषणाएं कागजों से आगे नहीं बढ़ सकीं। इसलिए किसान चाहते हैं कि इस बार निर्माण कार्य समयबद्ध तरीके से पूरा हो और मिलें जल्द उत्पादन शुरू करें। उनके लिए असली उपलब्धि शिलान्यास नहीं, बल्कि उस दिन होगी जब उनकी गन्ने से लदी ट्रॉलियां फिर इन मिलों के गेट पर पहुंचेंगी।
NB18 की नजर
मिथिलांचल में यह परियोजना राजनीतिक घोषणा से कहीं अधिक आर्थिक महत्व रखती है। अगर सरकार अपनी समयसीमा पर खरी उतरती है, तो यह सिर्फ दो चीनी मिलों का पुनर्जन्म नहीं होगा, बल्कि खेती, रोजगार और स्थानीय कारोबार को नई दिशा देने वाला कदम साबित हो सकता है। अब नजर 20 नवंबर पर नहीं, बल्कि उसके बाद शुरू होने वाले काम की रफ्तार पर रहेगी।

