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खगड़िया में कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे अस्पताल, मरीजों की जान से खिलवाड़! आखिर कहां सोया है स्वास्थ्य विभाग?

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सदर अस्पताल रोड से प्रखंडों तक निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सवाल, छोटे कमरों में इलाज और डॉक्टरों की उपलब्धता की जांच जरूरी; NB18 ने सिविल सर्जन से पूछा तो बोले—अभी व्यस्त हूं, बाद में बात करते हैं

खगड़िया | NB18 की विशेष रिपोर्ट

खगड़िया में अस्पताल खुल रहे हैं, मरीज इलाज कराने पहुंच रहे हैं, लेकिन इन अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा के लिए जरूरी इंतजाम हैं या नहीं, इसकी निगरानी कौन कर रहा है? जिला मुख्यालय के सदर अस्पताल रोड से लेकर प्रखंडों तक संचालित निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि कुछ चिकित्सा संस्थानों में जरूरी सुविधाओं और निर्धारित मानकों की अनदेखी हो सकती है। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग की जांच और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि मरीजों की जिंदगी से जुड़े मामले में स्वास्थ्य विभाग की निगरानी आखिर कितनी प्रभावी है?

जिला मुख्यालय के सदर अस्पताल रोड के आसपास संचालित निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की पंजीकरण स्थिति, चिकित्सकों की उपलब्धता और इलाज की व्यवस्था की जांच जरूरी है। संकरी गलियों और छोटे कमरों में चल रहे चिकित्सा केंद्रों में मरीजों के लिए पर्याप्त जगह, जरूरी उपकरण, प्रशिक्षित कर्मचारी और आपातकालीन सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं, इसकी पड़ताल होनी चाहिए।

अस्पताल का बोर्ड लगा देना और डॉक्टर का नाम लिख देना सुरक्षित इलाज की गारंटी नहीं है। मरीजों को इलाज देने वाले चिकित्सकों की योग्यता, उनकी वास्तविक मौजूदगी और अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं का सत्यापन जरूरी है। यदि कोई संस्थान बिना वैध पंजीकरण या निर्धारित मानकों के संचालित हो रहा है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई करना स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है।

जिला मुख्यालय में ही सवाल, तो बाकी जिले का क्या हाल?

सदर अस्पताल रोड सहित जिला मुख्यालय के विभिन्न इलाकों में निजी चिकित्सा संस्थानों की स्थिति की जांच जरूरी है। यही नहीं, जिले के प्रखंडों में संचालित निजी अस्पतालों की भी पड़ताल होनी चाहिए। आखिर कितने अस्पताल वैध रूप से पंजीकृत हैं? कितनों का नियमित निरीक्षण किया जाता है? जांच में गड़बड़ी मिलने पर कितने संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई हुई?

इन सवालों के जवाब के बिना स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था का आकलन करना मुश्किल है। मरीज और उनके परिजन अस्पताल में इलाज कराने पहुंचते समय यह उम्मीद करते हैं कि उन्हें योग्य डॉक्टर और सुरक्षित चिकित्सा सुविधा मिलेगी। यदि जरूरी मानकों की अनदेखी होती है, तो मरीजों की जान जोखिम में पड़ सकती है।

नियमों की निगरानी करने वाला विभाग ही यदि जांच और कार्रवाई का स्पष्ट ब्योरा सामने नहीं रखता, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।

डॉक्टर के नाम पर इलाज, सर्जरी की जिम्मेदारी किसकी?

निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली में डॉक्टरों की उपलब्धता और सर्जरी करने वाले चिकित्सकों की योग्यता सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में हैं। आरोप हैं कि कुछ संस्थानों में बोर्ड पर डॉक्टरों के नाम दर्ज होने के बावजूद उनकी वास्तविक मौजूदगी और इलाज में भूमिका की जांच जरूरी है।

क्या मरीजों का इलाज योग्य चिकित्सक कर रहे हैं? क्या सर्जरी के दौरान संबंधित सर्जन मौजूद रहते हैं? क्या अस्पताल में आपातकालीन स्थिति से निपटने की पर्याप्त व्यवस्था है? इन बिंदुओं की जांच अस्पताल के रिकॉर्ड, चिकित्सकों की योग्यता और वास्तविक निरीक्षण के आधार पर होनी चाहिए।

यदि कहीं बिना आवश्यक योग्यता या अनुमति के इलाज अथवा सर्जरी किए जाने की पुष्टि होती है, तो यह गंभीर मामला होगा। ऐसे मामलों में जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। मरीजों की सुरक्षा के मामले में किसी भी तरह की लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

NB18 ने सवाल किया, सिविल सर्जन बोले—अभी व्यस्त हूं

निजी अस्पतालों के संचालन और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी को लेकर NB18 ने सिविल सर्जन डॉ. रामेन्द्र कुमार से सवाल किया। उन्होंने व्यस्त होने की बात कही और बाद में बात करने को कहा। इसके बाद फोन कॉल समाप्त हो गई।

सिविल सर्जन का व्यस्त होना अपनी जगह है, लेकिन जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े सवालों का जवाब भी जरूरी है। आखिर निजी अस्पतालों के निरीक्षण की जिम्मेदारी किस तरह निभाई जा रही है? पंजीकरण और चिकित्सकीय मानकों की जांच के लिए विभाग ने क्या कदम उठाए हैं? नियमों का उल्लंघन करने वालों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है?

इन सवालों पर विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना चाहिए। मरीजों की सुरक्षा से जुड़े मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों जरूरी हैं। NB18 के सवालों का जवाब बाद में सही, लेकिन अस्पतालों की निगरानी का हिसाब जनता के सामने आना चाहिए।

हादसे के बाद जागेगा विभाग या पहले होगी जांच?

किसी अस्पताल में गंभीर लापरवाही की शिकायत सामने आने के बाद जांच शुरू करना पर्याप्त नहीं है। स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता ऐसी व्यवस्था बनाना होनी चाहिए, जिसमें संभावित गड़बड़ियों की पहचान समय रहते हो सके।

इसके लिए जिले के निजी अस्पतालों का निरीक्षण, पंजीकरण का सत्यापन, डॉक्टरों की योग्यता की जांच और मरीजों की सुरक्षा संबंधी मानकों की समीक्षा जरूरी है। जहां अनियमितता मिले, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। निरीक्षण और कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक होने से लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा।

खगड़िया में निजी अस्पतालों के संचालन को लेकर उठ रहे सवालों पर अब स्वास्थ्य विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। पंजीकृत अस्पतालों की सूची, निरीक्षण का रिकॉर्ड और कार्रवाई का ब्योरा सामने आने से वास्तविक तस्वीर साफ होगी।

NB18 की पड़ताल जारी रहेगी

मरीजों की जिंदगी से जुड़ा मामला किसी भी तरह की लापरवाही के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। खगड़िया में निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। NB18 की पड़ताल जारी रहेगी

अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग इन सवालों पर क्या जवाब देता है और निजी अस्पतालों की निगरानी के लिए जमीन पर क्या कदम उठाता है।

सिविल सर्जन डॉ. रामेन्द्र कुमार का विस्तृत पक्ष मिलने पर उसे भी रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा।

 

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