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राष्ट्र पहले: फैसला एक मंत्री का नहीं, लोकतंत्र, जवाबदेही और भारत के भविष्य का है

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  1. ✍️ अभिजीत सिन्हा

प्रधान संपादक, NB18 बिहार

देश कभी केवल सरकारों से नहीं चलता। देश चलता है जनता के विश्वास से, युवाओं के सपनों से, संविधान की मर्यादा से और उन निर्णयों से जो समय आने पर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर लिए जाते हैं। पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने भारतीय लोकतंत्र को एक बार फिर कठोर परीक्षा के दौर से गुजारा। छात्रों का आंदोलन, शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और अंततः केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा—इन सभी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में कोई भी पद जनता के विश्वास से बड़ा नहीं होता।

सरकार के इस निर्णय को अलग-अलग राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा। कोई इसे विपक्ष के दबाव की जीत बताएगा, कोई छात्रों की सफलता और कोई सरकार की रणनीति। लेकिन यदि इन तात्कालिक प्रतिक्रियाओं से ऊपर उठकर देखा जाए, तो एक संदेश स्पष्ट दिखाई देता है—लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज़ को अनदेखा नहीं किया जा सकता और सरकार ने यह दिखाया कि वह जनभावनाओं के प्रति संवेदनशील है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर वर्षों से एक बात कही जाती रही है कि वे जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय परिस्थितियों का आकलन करते हैं, संस्थागत फीडबैक लेते हैं और फिर ऐसा निर्णय करते हैं जिसका संदेश केवल वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी हो। समर्थक इसी दृष्टिकोण से इस फैसले को देखते हैं।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष देश का युवा है। भारत दुनिया का सबसे युवा लोकतंत्र है। यहाँ का छात्र केवल परीक्षा नहीं देता, बल्कि आने वाले भारत का निर्माण भी करता है। इसलिए उसकी चिंता, उसकी आशंका और उसकी आवाज़ को गंभीरता से सुनना किसी भी सरकार का दायित्व है। यदि युवाओं का विश्वास डगमगाता है, तो उसका प्रभाव केवल शिक्षा व्यवस्था पर नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य पर पड़ता है।

साथ ही, एक दूसरी सच्चाई को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र आंदोलन का अधिकार देता है, लेकिन अराजकता का नहीं। संविधान विरोध की अनुमति देता है, लेकिन हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने, नफरत फैलाने या कानून-व्यवस्था को चुनौती देने की अनुमति नहीं देता। छात्र आंदोलन तब तक लोकतंत्र की शक्ति है, जब तक उसका उद्देश्य सुधार और जवाबदेही हो। यदि कोई भी व्यक्ति या समूह आंदोलन की आड़ में हिंसा या अवैध गतिविधियों का रास्ता चुनता है, तो उस पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इससे वास्तविक आंदोलन की विश्वसनीयता भी सुरक्षित रहती है।

आज भारत ऐसे दौर में है जब वह वैश्विक स्तर पर अपनी आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक भूमिका को लगातार मजबूत कर रहा है। ऐसे समय में देश के भीतर स्थिरता, सामाजिक विश्वास और राष्ट्रीय एकता केवल राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि विकास की अनिवार्य शर्त हैं। निवेश, उद्योग, शिक्षा, रोजगार और नवाचार—ये सब तभी आगे बढ़ते हैं जब समाज में भरोसा बना रहे।

इस पूरे घटनाक्रम से विपक्ष के लिए भी एक संदेश है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार और दायित्व दोनों है। लेकिन हर राजनीतिक संघर्ष का अंतिम उद्देश्य राष्ट्रहित होना चाहिए। यदि जनआंदोलन को केवल सत्ता परिवर्तन के औजार के रूप में देखा जाएगा, तो सबसे बड़ा नुकसान उन छात्रों का होगा जिनकी वास्तविक समस्याओं ने इस बहस को जन्म दिया।

सरकार के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। केवल मंत्री बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही, समयबद्ध सुधार और युवाओं का विश्वास बहाल करना अब सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि यह निर्णय व्यापक सुधारों की शुरुआत बनता है, तभी इसका वास्तविक महत्व सिद्ध होगा।

आज आवश्यकता किसी की राजनीतिक जीत का उत्सव मनाने की नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता को मजबूत करने की है। यह समय युवाओं को आश्वस्त करने का है कि उनकी आवाज़ सुनी जाएगी; यह समय समाज को यह भरोसा दिलाने का है कि कानून का राज सर्वोपरि रहेगा; और यह समय दुनिया को यह दिखाने का है कि भारत अपनी चुनौतियों का समाधान संविधान, लोकतंत्र और जवाबदेही के माध्यम से करता है।

किसी भी लोकतंत्र की असली परीक्षा संकट के समय होती है। यदि सरकार संवेदनशील हो, युवा जिम्मेदार हों, विपक्ष रचनात्मक हो और संस्थाएँ निष्पक्ष रहें, तो हर संकट सुधार का अवसर बन सकता है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि यहाँ असहमति भी है, बहस भी है, चुनाव भी हैं और अंततः राष्ट्र सर्वोपरि है।

राजनीति आती-जाती रहेगी। मंत्री बदलते रहेंगे। लेकिन भारत की एकता, लोकतंत्र की गरिमा, युवाओं का भविष्य और राष्ट्रहित—इनसे कभी समझौता नहीं होना चाहिए। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश है।

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