सरकार बोली—विदेश से पैसा आए तो उसका हिसाब भी होगा, किस काम में लगा यह भी बताना होगा; कांग्रेस ने विरोध का ऐलान किया
नई दिल्ली। विदेशी फंडिंग को लेकर संसद में एक बार फिर बड़ा राजनीतिक टकराव खड़ा हो गया है। मोदी सरकार FCRA Amendment Bill 2026 के जरिए विदेशी चंदे के इस्तेमाल को लेकर नियमों को और स्पष्ट तथा जवाबदेह बनाने की कोशिश में है। दूसरी तरफ कांग्रेस समेत विपक्षी दल इस प्रस्तावित बदलाव का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने सोमवार को कहा कि यदि बिल मूल प्रारूप में लाया जाता है तो कांग्रेस उसका विरोध करेगी।
मामला सिर्फ इतना नहीं है कि विदेश से पैसा भारत में आए या नहीं। असली सवाल है—पैसा आए तो उसका इस्तेमाल कहां हो?
यही वह सवाल है जिस पर सरकार विदेशी योगदान की व्यवस्था को और मजबूत करना चाहती है।
विदेशी पैसा, लेकिन हिसाब भारतीय कानून का
FCRA का मूल उद्देश्य ही विदेशी योगदान की प्राप्ति और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना है। कानून यह सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है कि विदेशी धन का इस्तेमाल देश के राष्ट्रीय हित के खिलाफ गतिविधियों में न हो।
प्रस्तावित 2026 संशोधन में सरकार विदेशी फंड से जुड़ी पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने पर जोर दे रही है। सरकार का तर्क है कि विदेशी स्रोत से आने वाले धन के इस्तेमाल को लेकर नियम जितने स्पष्ट होंगे, उतना ही यह पता लगाना आसान होगा कि पैसा कहां से आया और कहां गया।
धर्मांतरण के मुद्दे पर भी सरकार सख्त
FCRA को लेकर सबसे संवेदनशील सवाल विदेशी धन के धार्मिक गतिविधियों में इस्तेमाल का है। सरकार का रुख है कि विदेशी योगदान का इस्तेमाल घोषित उद्देश्य और भारतीय कानून के अनुरूप होना चाहिए। धार्मिक गतिविधि के नाम पर मिलने वाले विदेशी धन का दुरुपयोग या उसे कानून के खिलाफ गतिविधियों में इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
यानी सरकार की लाइन सीधी है—
विदेश से पैसा आए, किसी वैध सामाजिक काम में लगे तो कोई समस्या नहीं। लेकिन विदेशी धन का इस्तेमाल कानून तोड़ने या देश के हितों के खिलाफ गतिविधि के लिए नहीं होना चाहिए।
कांग्रेस का विरोध क्यों?
कांग्रेस ने प्रस्तावित FCRA संशोधन को लेकर विरोध का ऐलान किया है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इसे लेकर सरकार पर NGOs को निशाना बनाने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि प्रस्तावित प्रावधान सरकार को जरूरत से ज्यादा अधिकार दे सकते हैं।
कांग्रेस ने अपने सांसदों को 10 से 12 अगस्त तक संसद में मौजूद रहने के लिए व्हिप भी जारी किया है। इससे साफ है कि FCRA पर संसद के भीतर टकराव बढ़ने वाला है।
लेकिन सरकार के सामने भी अपना तर्क है—
अगर विदेशी फंड का इस्तेमाल नियमों के मुताबिक हो रहा है तो पारदर्शिता और हिसाब-किताब की व्यवस्था से परेशानी क्यों होनी चाहिए?
सवाल कांग्रेस से भी, लेकिन आरोप नहीं—हिसाब से
FCRA पर कांग्रेस के विरोध के बाद राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है। विदेशी फंडिंग को लेकर किसी भी पार्टी, संस्था या संगठन पर आरोप लगाने से पहले उसके आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आने चाहिए।
इसलिए बहस का रास्ता आरोप नहीं, दस्तावेज और पारदर्शिता होना चाहिए।
किसी को विदेश से पैसा मिला है तो कितना मिला?
किस उद्देश्य से मिला?
किस खाते में आया?
कहां खर्च हुआ?
और क्या खर्च उसी उद्देश्य के लिए हुआ जिसके लिए पैसा मिला था?
FCRA की असली लड़ाई इन्हीं सवालों की है।
आज की राजनीति का बड़ा सवाल
FCRA संशोधन को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत की कोशिशें भी चल रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक सरकार कुछ विपक्षी दलों को साथ लाने और विधेयक पर गतिरोध कम करने की कोशिश कर रही है।
बिल फिलहाल कानून नहीं बना है। FCRA Amendment Bill 2026 लोकसभा में 25 मार्च को पेश किया गया था और अभी विचाराधीन है।
अब नजर संसद की बहस पर है।
क्योंकि सवाल केवल मोदी सरकार बनाम विपक्ष का नहीं है।
सवाल यह है कि—
भारत में आने वाला विदेशी पैसा भारत के कानून से ऊपर होगा या भारतीय कानून के हिसाब से चलेगा?
अगर विदेशी पैसा शिक्षा में लगे—हिसाब हो।
स्वास्थ्य में लगे—हिसाब हो।
गरीबों की मदद में लगे—हिसाब हो।
धार्मिक या सामाजिक गतिविधि में लगे—हिसाब हो।
और अगर किसी पैसे का इस्तेमाल कानून के खिलाफ होता है, तो कार्रवाई भी होनी चाहिए।
यही पारदर्शिता है और यही किसी भी विदेशी फंडिंग व्यवस्था की पहली शर्त होनी चाहिए।
NB18 का सवाल
विदेशी पैसा भारत में आएगा तो उसका हिसाब भारत के कानून को देना ही पड़ेगा।
फिर सवाल यह नहीं कि हिसाब क्यों मांगा जा रहा है… सवाल यह है कि हिसाब देने में आपत्ति किसे और क्यों है?

