शिक्षा विभाग की जांच रिपोर्ट में वित्तीय और प्रक्रियागत सवाल; DEO अमरेंद्र गोंड बोले—मुख्यालय को भेजी संपूर्ण रिपोर्ट, अनियमितता में एक-एक रुपये की होगी वसूली। नगर थानाध्यक्ष ने कहा—पुलिस गंभीरता से कर रही जांच। तत्कालीन प्रधानाध्यापक का मोबाइल बंद मिलने से उनका पक्ष नहीं मिल सका।
खगड़िया | NB18 की विशेष पड़ताल
सरकारी विद्यालय में करोड़ों रुपये के भुगतान का मामला हो, लाखों रुपये की नकद निकासी दर्ज हो और छात्र-छात्राओं से प्राप्त शुल्क के हिसाब में अंतर सामने आए—तो सवाल पूछे ही जाएंगे। खगड़िया के जेएनकेटी इंटर विद्यालय से जुड़ा मामला अब इसी जवाबदेही की कसौटी पर है।
जिला शिक्षा पदाधिकारी, खगड़िया के पत्रांक 641, दिनांक 24 मार्च 2026 के साथ संलग्न जांच प्रतिवेदन में निर्माण एवं मरम्मत कार्यों, भुगतान प्रक्रिया, स्टॉल से प्राप्त राशि और विद्यार्थियों के शुल्क के हिसाब से जुड़े कई बिंदुओं पर सवाल दर्ज हैं। मामले में प्राथमिकी संख्या 104/26 दर्ज होने की जानकारी है। फिर भी पुलिस अनुसंधान की वर्तमान स्थिति और विभागीय कार्रवाई के अगले चरण को लेकर स्पष्ट सार्वजनिक जानकारी सामने आना जरूरी है।
जिला शिक्षा पदाधिकारी अमरेंद्र गोंड ने NB18 को बताया कि शिक्षा विभाग की ओर से संपूर्ण रिपोर्ट मुख्यालय को भेज दी गई है। उन्होंने कहा कि अनियमितता के मामले में एक-एक रुपये की वसूली की जाएगी। नगर थानाध्यक्ष के अनुसार, पुलिस मामले की गंभीरता से जांच कर रही है, लेकिन अनुसंधान के दौरान क्या हो रहा है, इसे फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी बताया कि मामला उच्च न्यायालय में गया है।
NB18 ने संबंधित तत्कालीन प्रधानाध्यापक श्रीराम प्रसाद से उनका पक्ष जानने के लिए मोबाइल फोन पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन मोबाइल बंद मिला। इस कारण उनका पक्ष नहीं मिल सका। उनका जवाब मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
₹1,62,77,100 का भुगतान, ₹36,70,000 नकद—हर रुपये का हिसाब सामने आए
जांच प्रतिवेदन के पृष्ठ 3 और 4 के अनुसार, कुल ₹1,62,77,100 के भुगतान का उल्लेख है। इसमें ₹1,26,07,100 संवेदकों के खातों में भुगतान किए जाने और ₹36,70,000 विद्यालय के खाते से नकद निकालकर भुगतान किए जाने की बात दर्ज है।
जांच समिति ने नकद भुगतान से संबंधित अभिश्रवों में आवश्यक प्रविष्टियों और राजस्व टिकट से जुड़ी कमियों का उल्लेख किया है।
अब सवाल सीधे हैं—₹36.70 लाख किस-किस व्यक्ति को दिए गए? भुगतान प्राप्तकर्ताओं के हस्ताक्षर और पहचान का सत्यापन हुआ या नहीं? क्या प्रत्येक भुगतान का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है? क्या बैंक निकासी, रोकड़बही और भुगतान अभिश्रवों का मिलान पूरा किया गया?
इतनी बड़ी नकद राशि के भुगतान का पूरा दस्तावेजी हिसाब सार्वजनिक हित का विषय है। नकद निकासी अपने आप में गबन का प्रमाण नहीं है, लेकिन जांच रिपोर्ट में दर्ज कमियों का जवाब देना और उनका सत्यापन करना जरूरी है।
लगभग ₹1.35 करोड़ के निर्माण कार्य—स्वीकृति और मापी का हिसाब कहां?
जांच रिपोर्ट में लगभग ₹1.35 करोड़ के निर्माण एवं मरम्मत कार्यों से संबंधित प्राक्कलन और मापी पुस्तिका का उल्लेख है। प्रतिवेदन में तकनीकी स्वीकृति, आवश्यक अभिलेखों और संवेदकों के चयन की प्रक्रिया पर सवाल दर्ज हैं।
सरकारी निर्माण कार्यों में केवल भुगतान दर्ज होना पर्याप्त नहीं है। स्वीकृत प्राक्कलन, वास्तविक निर्माण, मापी पुस्तिका, तकनीकी स्वीकृति और भुगतान का आपस में मेल खाना भी जरूरी है।
शिक्षा विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या सभी कार्यों का भौतिक सत्यापन हुआ? क्या तकनीकी स्वीकृति के दस्तावेज उपलब्ध हैं? और क्या भुगतान के मुकाबले किए गए कार्यों का स्वतंत्र मिलान कराया गया?
यदि प्रक्रिया सही थी, तो दस्तावेज जवाब देंगे; यदि कोई अनियमितता प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
पुराने स्टॉल की आय में ₹41,175 का अंतर—राशि कहां गई?
जांच प्रतिवेदन में पुराने स्टॉल से ₹3,20,878 प्राप्त होने का उल्लेख है। इसमें से ₹2,79,703 बैंक खाते में जमा किए जाने की बात दर्ज है।
– कुल प्राप्त राशि: ₹3,20,878
– बैंक में जमा राशि: ₹2,79,703
– दर्ज अंतर: ₹41,175
इस अंतर का क्या कारण है? क्या राशि किसी वैध मद में खर्च हुई? क्या उसके समर्थन में रसीद, भुगतान प्रमाण या अन्य लेखा दस्तावेज हैं?
इन सवालों का जवाब मूल अभिलेखों और संबंधित पक्षों के स्पष्टीकरण से मिलना चाहिए। जांच में दर्ज अंतर को बिना सत्यापन के गबन घोषित नहीं किया जा सकता, लेकिन उसका हिसाब स्पष्ट होना आवश्यक है।
छात्र-छात्राओं के शुल्क में ₹84,145 का अंतर—जवाबदेही कौन लेगा?
जांच रिपोर्ट के पृष्ठ 5 पर कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों से विभिन्न मदों में वसूले जाने वाले शुल्क का विवरण दिया गया है।
– कुल शुल्क: ₹14,32,520
– बैंक में जमा राशि: ₹13,48,375
– दर्ज अंतर: ₹84,145
रिपोर्ट में इस अंतर को वित्तीय अनियमितता और विभागीय निर्देशों के अनुपालन से जुड़ा विषय बताया गया है।
विद्यार्थियों से प्राप्त शुल्क का पूरा हिसाब होना चाहिए। विभाग को बताना चाहिए कि इस अंतर का मिलान हुआ या नहीं, राशि प्राप्त होने के मूल अभिलेख क्या कहते हैं और संबंधित पक्षों ने क्या स्पष्टीकरण दिया है। बच्चों की शिक्षा से जुड़ी राशि का हिसाब अस्पष्ट नहीं रहना चाहिए।
16 नए स्टॉल का निर्माण शुरू, फिर बंद—निर्णय किसका था?
जांच प्रतिवेदन के अनुसार, विद्यालय परिसर में 16 नए स्टॉल के निर्माण के लिए फाउंडेशन का काम शुरू किया गया था, लेकिन विभागीय पदाधिकारी के मौखिक आदेश के बाद निर्माण रोक दिया गया। रिपोर्ट में प्राक्कलन की प्रति जांच समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए जाने का भी उल्लेख है।
किस स्वीकृति से निर्माण शुरू हुआ? काम रोकने का आदेश किसने दिया? क्या लिखित आदेश उपलब्ध है? अधूरे निर्माण पर कितनी राशि खर्च हुई और उसका भुगतान किस आधार पर किया गया?
इन प्रश्नों का उत्तर संबंधित निर्माण अभिलेखों और आधिकारिक स्पष्टीकरण से सामने आना चाहिए।
FIR 104/26 दर्ज—महीनों बाद पुलिस जांच की स्थिति क्या है?
मामले में प्राथमिकी संख्या 104/26 दर्ज होने की जानकारी है। नगर थानाध्यक्ष ने कहा है कि पुलिस गंभीरता से जांच कर रही है, लेकिन अनुसंधान की वर्तमान गतिविधियों को फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
पुलिस जांच की गोपनीयता का सम्मान करते हुए भी यह जानना जरूरी है कि अनुसंधान की वर्तमान स्थिति क्या है और वित्तीय अभिलेखों के सत्यापन की प्रक्रिया कहां तक पहुंची है।
क्या बैंक विवरण और भुगतान अभिश्रवों की जांच की गई? क्या निर्माण संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन हुआ? क्या संबंधित लोगों के बयान लिए गए? क्या अनुसंधान में कोई महत्वपूर्ण चरण अभी बाकी है?
NB18 का सवाल है—महीनों बीतने के बाद जांच किस चरण में है और उसकी प्रगति की आधिकारिक स्थिति कब स्पष्ट होगी?
विभागीय कार्रवाई जारी—मुख्यालय को रिपोर्ट भेजने के बाद क्या हुआ?
जिला शिक्षा पदाधिकारी अमरेंद्र गोंड के अनुसार, विभाग की ओर से संपूर्ण रिपोर्ट मुख्यालय को भेज दी गई है। उन्होंने अनियमितता के मामले में एक-एक रुपये की वसूली की बात कही है।
लेकिन रिपोर्ट भेजना और वसूली का अंतिम आदेश जारी होना अलग-अलग चरण हैं। इसलिए विभाग को बताना चाहिए कि मुख्यालय ने रिपोर्ट पर क्या निर्णय लिया, वित्तीय देनदारी का अंतिम निर्धारण हुआ या नहीं और विभागीय कार्रवाई किस चरण में है।
यदि कार्रवाई चल रही है, तो उसकी वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने में क्या बाधा है? क्या संबंधित पक्षों से जवाब मांगा गया है? क्या निर्माण कार्यों और वित्तीय अंतर का स्वतंत्र सत्यापन कराया गया है? इन सवालों का जवाब विभाग की ओर से आना चाहिए।
उच्च न्यायालय का मामला—गिरफ्तारी पर रोक और जांच पर रोक एक बात नहीं
अधिकारियों ने बताया है कि आरोपी पक्ष उच्च न्यायालय गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गिरफ्तारी पर रोक लगी है, पुलिस अनुसंधान या विभागीय कार्रवाई पर नहीं।
हालांकि, अदालत के आदेश की प्रमाणित प्रति देखे बिना उसकी सटीक शर्तों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए। गिरफ्तारी पर रोक अपने आप में पुलिस जांच या विभागीय कार्रवाई पर रोक के समान नहीं होती; वास्तविक स्थिति आदेश की भाषा पर निर्भर करेगी।
इसलिए संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए कि पुलिस अनुसंधान और विभागीय कार्रवाई वर्तमान में किस स्थिति में हैं तथा अदालत के आदेश का उन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
क्या संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होगी?
जब निर्माण कार्यों की स्वीकृति, भुगतान, तकनीकी सत्यापन, बैंक में जमा राशि और वित्तीय निगरानी पर सवाल उठते हैं, तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या निर्धारित स्वीकृतियां नियमानुसार दी गईं? क्या भुगतान से पहले दस्तावेजों का सत्यापन हुआ? क्या वित्तीय निगरानी की जिम्मेदारी निभाई गई?
क्या इस मामले में किसी अधिकारी की मिलीभगत थी या निगरानी में चूक हुई?
उपलब्ध जांच प्रतिवेदन अधिकारियों की मिलीभगत को सिद्ध नहीं करता। इसलिए किसी अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन संबंधित अधिकारियों की भूमिका और निगरानी व्यवस्था की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता प्रमाणित हो, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जा सके।
NB18 के सात सीधे सवाल
1. ₹36.70 लाख के नकद भुगतान का पूरा सत्यापित हिसाब कहां है?
2. पुराने स्टॉल की राशि में ₹41,175 के अंतर का क्या स्पष्टीकरण है?
3. छात्र शुल्क में ₹84,145 के अंतर का मिलान हुआ या नहीं?
4. लगभग ₹1.35 करोड़ के निर्माण कार्यों की तकनीकी और भौतिक जांच की स्थिति क्या है?
5. मुख्यालय को भेजी गई संपूर्ण रिपोर्ट पर क्या निर्णय हुआ?
6. FIR 104/26 में पुलिस अनुसंधान की वर्तमान स्थिति क्या है?
7. क्या संबंधित अधिकारियों की भूमिका और निगरानी व्यवस्था की भी जांच की गई?
रिपोर्ट भेजने और जांच का भरोसा देने से आगे कार्रवाई कब?
जेएनकेटी इंटर विद्यालय से संबंधित जांच प्रतिवेदन में वित्तीय और प्रक्रियागत सवाल दर्ज हैं। जिला शिक्षा पदाधिकारी ने मुख्यालय को रिपोर्ट भेजने और अनियमितता में एक-एक रुपये की वसूली की बात कही है। नगर थानाध्यक्ष ने पुलिस जांच को गंभीर बताया है। तत्कालीन प्रधानाध्यापक से संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन मोबाइल बंद मिलने के कारण उनका पक्ष नहीं मिल सका।
अब शिक्षा विभाग को विभागीय कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और पुलिस को कानून के अनुरूप अनुसंधान की प्रगति पर आधिकारिक जानकारी देनी चाहिए। यदि कोई वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार वसूली और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
सरकारी धन का हिसाब मांगना किसी पर फैसला सुनाना नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना है। NB18 का सवाल स्पष्ट है—जांच रिपोर्ट में दर्ज रकमों का पूरा हिसाब कब सामने आएगा और कार्रवाई की अगली ठोस जानकारी जनता को कब मिलेगी?
