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बांकीपुर : लड़ाई एक सीट की नहीं, सियासी भविष्य की है

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अभिजीत सिन्हा/पटना

बिहार की राजनीति में चुनाव केवल चुनाव नहीं होते। यहां हर उपचुनाव को सत्ता का सेमीफाइनल और हर बयान को राजनीतिक भूचाल बताने की पुरानी परंपरा रही है। अब पटना का बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र इसी परंपरा को आगे बढ़ाता दिख रहा है। एक सीट के संभावित उपचुनाव ने सत्ता पक्ष, विपक्ष और तीसरे मोर्चे—तीनों को बेचैन कर दिया है।

बांकीपुर वर्षों से भाजपा का मजबूत किला रहा है। लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि किले बाहर से कम, भीतर की कमजोरियों से ज्यादा ढहते हैं। यही वजह है कि सत्ता पक्ष विकास, सुशासन और उपलब्धियों की लंबी फेहरिस्त लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। दूसरी ओर, राजद और कांग्रेस सरकार की नीतियों को जनता की नाराजगी से जोड़ने में जुटे हैं। सवाल यह है कि क्या विपक्ष केवल सत्ता विरोधी लहर के भरोसे राजनीति करना चाहता है, या उसके पास बिहार के भविष्य का कोई ठोस खाका भी है?

इस राजनीतिक शोर-शराबे के बीच सबसे दिलचस्प किरदार प्रशांत किशोर हैं। वर्षों तक दूसरों को चुनाव जिताने की रणनीति बनाने वाले प्रशांत अब खुद जनता की अदालत में हैं। जन सुराज की सभाओं में भीड़ है, भाषणों में व्यवस्था परिवर्तन का वादा है और राजनीति को नई दिशा देने के दावे भी हैं। लेकिन बिहार की जनता ने ऐसे प्रयोग पहले भी देखे हैं। यहां राजनीतिक आदर्शवाद अक्सर चुनावी गणित के आगे दम तोड़ देता है।

दरअसल, बिहार की राजनीति इन दिनों एक विचित्र दौर से गुजर रही है। हर दल बदलाव की बात करता है, लेकिन बदलाव का अर्थ अपने-अपने हिसाब से तय करना चाहता है। सत्ता पक्ष विकास की उपलब्धियों का दावा करता है, जबकि विपक्ष उन्हीं दावों की हकीकत पूछता है। जनता के सामने रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन जैसे पुराने सवाल अब भी खड़े हैं, लेकिन चुनावी बहस अक्सर जातीय समीकरणों और राजनीतिक गठबंधनों के इर्द-गिर्द घूमने लगती है।

एनडीए के भीतर सीटों और हिस्सेदारी को लेकर मंथन जारी है। महागठबंधन भी अपनी एकजुटता का संदेश देने की कोशिश कर रहा है। छोटे दल अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने में लगे हैं। हर कोई जनता की चिंता की बात करता है, लेकिन चुनाव बीतते ही जनता अक्सर फिर से अपनी समस्याओं के साथ अकेली खड़ी नजर आती है।

बांकीपुर का चुनाव जब भी होगा, वह केवल यह तय नहीं करेगा कि विधानसभा में कौन पहुंचेगा। वह यह भी बताएगा कि बिहार की राजनीति अभी भी पुराने नारों और जातीय समीकरणों के सहारे चलना चाहती है या वास्तव में विकास और जवाबदेही को अपनी प्राथमिकता बनाने को तैयार है।

लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक होती है। नेता आते हैं, गठबंधन बनते और टूटते हैं, राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन जनता के सवाल वही रहते हैं। बांकीपुर की लड़ाई का असली महत्व भी इसी में छिपा है कि यह चुनाव नेताओं की महत्वाकांक्षाओं से अधिक, बिहार की आकांक्षाओं की परीक्षा बनने जा रहा है।

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