Uncategorized

राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में : विदेशी मूल की राजनीति पर क्यों फिर तेज हो रही है बहस?

1 Mins read
Uncategorized

राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में : विदेशी मूल की राजनीति पर क्यों फिर तेज हो रही है बहस?

1 Mins read
अभिजीत सिन्हा | प्रधान संपादक, NB18

भारत की राजनीति में विदेशी मूल का मुद्दा कोई नया नहीं है। यह बहस कई बार उठी, कई बार थमी, लेकिन आज एक बार फिर देश के राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता के बीच यह चर्चा तेज हो गई है। वजह सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि वह बदलता हुआ भारत है, जो अब खुद को दुनिया की अग्रणी ताकतों में देखना चाहता है।
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है। सत्ता बदलना भी लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जब राजनीतिक संघर्ष की आवाज़ विदेशी मंचों तक पहुंचती है और वहां भारत की आंतरिक राजनीति अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इससे सबसे अधिक लाभ किसका और नुकसान किसका होता है।
आज भारत 140 करोड़ लोगों का आत्मविश्वासी राष्ट्र है। दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में उसकी गिनती हो रही है। वैश्विक कूटनीति में उसकी भूमिका लगातार मजबूत हुई है। ऐसे समय में हर राष्ट्रीय नेता के शब्द और कदम केवल राजनीतिक संदेश नहीं होते, बल्कि वे भारत की छवि से भी जुड़े होते हैं।
भारत की नई पीढ़ी, यानी Gen Z, अब पुराने राजनीतिक नारों से आगे निकल चुकी है। वह रोजगार, नवाचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और अवसरों की भाषा समझती है। इसलिए किसी भी राष्ट्रीय नेता के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस पीढ़ी की सोच, उसकी अपेक्षाओं और उसके बदलते राजनीतिक व्यवहार को समझने की है। जो नेतृत्व इस बदलाव को नहीं पढ़ पाएगा, वह आने वाले भारत की राजनीति को भी पूरी तरह नहीं समझ पाएगा।
विदेशी मूल का प्रश्न भारतीय राजनीति में लंबे समय से बहस का विषय रहा है। लोकतंत्र में किसी भी पात्र नागरिक को राजनीति करने का अधिकार है। लेकिन जनता हर नेता का मूल्यांकन इस आधार पर करती है कि उसके राजनीतिक निर्णय और सार्वजनिक बयान भारत के हितों को किस तरह प्रभावित करते हैं। लोकतांत्रिक असहमति और राष्ट्रीय हित—दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी बड़े नेता की सबसे बड़ी कसौटी है।
देश के भीतर सरकार की आलोचना और विदेश में भारत की राजनीतिक तस्वीर प्रस्तुत करने के तरीके में फर्क होता है। सरकारें अस्थायी होती हैं, लेकिन राष्ट्र स्थायी होता है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में लोग यह मानते हैं कि राजनीतिक लड़ाई संसद में हो, जनता के बीच हो, चुनावी मैदान में हो, लेकिन भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को लेकर सभी दलों की जिम्मेदारी समान होनी चाहिए।
आज का मतदाता भावनाओं से अधिक संदेश पढ़ता है। वह यह भी देखता है कि कौन-सा राजनीतिक विमर्श देश को जोड़ता है और कौन-सा उसे अनावश्यक विवादों में उलझाता है। यही वजह है कि राष्ट्रहित को लेकर जनता की अपेक्षाएं पहले से कहीं अधिक स्पष्ट और मुखर हुई हैं।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है। इसी विविधता में तीखी बहस भी होगी, सत्ता परिवर्तन भी होगा और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी। लेकिन यदि किसी एक बात पर राष्ट्रीय सहमति होनी चाहिए, तो वह यही कि भारत किसी भी दल, किसी भी परिवार और किसी भी व्यक्ति से बड़ा है।
सरकारें आएंगी और जाएंगी। चुनाव जीतने और हारने का सिलसिला चलता रहेगा। लेकिन भारत की प्रतिष्ठा, उसकी संप्रभुता और उसके दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित हर राजनीतिक दल और हर नेता की पहली प्राथमिकता होने चाहिए। यही लोकतंत्र का दायित्व है और यही राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी कसौटी भी।
आख़िरकार सवाल किसी एक नेता का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सोच का है जो यह तय करती है कि सत्ता पहले है या राष्ट्र। लोकतंत्र का उत्तर स्पष्ट है—राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में।

316 posts

About author
News Bihar 18 बिहार की खबरों का विश्वसनीय डिजिटल मंच। News Bihar 18 पर आपको बिहार की राजनीति, प्रशासन, विकास, शिक्षा, रोजगार, अपराध, सामाजिक सरोकार और देश-दुनिया से जुड़ी महत्वपूर्ण खबरें मिलती हैं। निष्पक्ष खबर • तथ्यपरक जानकारी • जनसरोकार 📍 बिहार की हर महत्वपूर्ण खबर पर हमारी नजर 🌐 newsbihar18.com
Articles

Leave a Reply

Install App