✍️ अभिजीत सिन्हा
लोकतंत्र की असली ताकत असहमति है। सरकार से सवाल पूछना, नीतियों का विरोध करना और सड़कों पर उतरकर अपनी बात कहना संविधान ने हर नागरिक को दिया है। लेकिन क्या लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि विरोध के नाम पर देश के प्रधानमंत्री और उनके परिवार के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जाए? यह सवाल आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि CJP आंदोलन अब अपने मूल मुद्दों से ज्यादा अपनी भाषा और तौर-तरीकों को लेकर चर्चा में है।
इसमें दो राय नहीं कि CJP आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया। यदि किसी आंदोलन के कारण सरकार जवाबदेह बनती है, व्यवस्था में सुधार की मांग उठती है और युवाओं की आवाज सत्ता तक पहुंचती है, तो यह लोकतंत्र की सफलता मानी जाएगी।
लेकिन हर आंदोलन की ताकत उसके मुद्दे होते हैं, उसकी भाषा नहीं।
जंतर-मंतर से लेकर सोशल मीडिया तक जो कुछ वीडियो सामने आए, उन्होंने पूरे आंदोलन पर सवाल खड़े कर दिए। उन वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत मां के लिए कथित रूप से जिस भाषा का इस्तेमाल हुआ, उसने आंदोलन के असली मुद्दों को पीछे धकेल दिया। सरकार की आलोचना और प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक शब्द—इन दोनों को एक तराजू पर नहीं तौला जा सकता।
भाजपा सांसद कंगना रनौत ने इन्हीं वीडियो पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आंदोलन की मांगों पर नहीं, बल्कि उस भाषा पर सवाल उठाया, जिसे उन्होंने भारतीय संस्कृति और लोकतांत्रिक मर्यादा के विरुद्ध बताया। उनके बयान से राजनीतिक विवाद खड़ा होना स्वाभाविक है, लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र अब गाली-गलौज की राजनीति को सामान्य मान ले?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, राहुल गांधी हों, ममता बनर्जी हों या भविष्य में कोई और इस पद पर बैठे—प्रधानमंत्री का पद व्यक्ति से बड़ा है। यह भारत की 140 करोड़ जनता का प्रतिनिधित्व करने वाला संवैधानिक पद है। उस पद का सम्मान किसी दल के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
लोकतंत्र में सरकारें कठघरे में खड़ी होंगी। उनसे सवाल भी पूछे जाएंगे। विरोध भी होगा और आंदोलन भी होंगे। लेकिन यदि आंदोलन की पहचान उसके मुद्दों से हटकर अभद्र भाषा, व्यक्तिगत हमलों और अशालीनता से होने लगे, तो सबसे पहले नुकसान उसी आंदोलन का होता है। जनता मुद्दे भूल जाती है और विवाद सुर्खियां बन जाता है।
इस पूरे प्रकरण में मीडिया भी कठघरे में है। आज टीआरपी और वायरल कंटेंट की होड़ में कई बार मूल मुद्दों से अधिक विवाद को जगह मिलती है। पत्रकारिता का धर्म केवल सनसनी परोसना नहीं, बल्कि समाज को सही संदर्भ देना है। मीडिया यदि आंदोलन का मुद्दा भी दिखाए और उसकी मर्यादा भी, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।
यह संपादकीय किसी दल के समर्थन या विरोध में नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक संस्कृति के पक्ष में है, जिसमें विरोध हो, लेकिन शालीनता के साथ; असहमति हो, लेकिन संविधान की मर्यादा में; सरकार से सवाल हों, लेकिन देश के सर्वोच्च निर्वाचित पद की गरिमा पर हमला नहीं।
याद रखिए—सरकारें बदलती हैं, दल बदलते हैं, नेता बदलते हैं। लेकिन भारत नहीं बदलता। प्रधानमंत्री का पद किसी व्यक्ति की नहीं, राष्ट्र की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। इसलिए आंदोलन कीजिए, आवाज उठाइए, सत्ता को चुनौती दीजिए, लेकिन लोकतंत्र को गाली-गलौज का मंच मत बनाइए।
क्योंकि टीआरपी से बड़ा देश है, राजनीति से बड़ा संविधान है और हर दल से बड़ा भारत।

