जलजमाव-अतिक्रमण से बेहाल शहर; राजस्व वसूली की व्यवस्था पर सवाल, जनता को सड़क के बजाय दीवार और पानी के बीच रास्ता तलाशने की मजबूरी
खगड़िया। खगड़िया शहर की यह तस्वीर सिर्फ जलजमाव की तस्वीर नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही शहरी व्यवस्था की विफलता का आईना है। बलुआही इलाके में बाबूलाल मध्य विद्यालय के पास सड़क का बड़ा हिस्सा पानी में डूबा है। सड़क, नाली और जलभराव का फर्क तक मिटता नजर आ रहा है। इसी इलाके की एक तस्वीर में एक महिला को दीवार के सहारे रास्ता पार करने को मजबूर होना पड़ा। वह दीवार पर शौक से नहीं चढ़ी थी। सिस्टम ने सड़क पर रास्ता नहीं छोड़ा, तो मजबूरी ने उसे दूसरा रास्ता चुनने पर मजबूर किया।
जनता पानी में, नगर परिषद किस काम में?
नगर परिषद का काम सिर्फ राजस्व वसूलना नहीं है। साफ सड़क, बेहतर जलनिकासी, अतिक्रमण नियंत्रण और नागरिकों के लिए सुगम आवागमन भी नगर निकाय की बुनियादी जिम्मेदारी है। लेकिन खगड़िया में हालात ऐसे हैं कि बारिश के बाद सड़कें जलमग्न हो जाती हैं और आम लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए पानी, कीचड़ और बाधाओं से जूझना पड़ता है।
राजस्व चाहिए तो व्यवस्था भी देनी होगी
शहर में फुटकर, सब्जी और ठेला विक्रेताओं से राजस्व वसूली की व्यवस्था है। अधिकृत संवेदक के माध्यम से वसूली किए जाने की बात सामने आती है। विक्रेताओं की रोजी-रोटी जरूरी है और उनसे निर्धारित शुल्क लेना भी व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि शुल्क लेने के बाद नगर परिषद की जिम्मेदारी कहां खत्म होती है? अगर सड़क किनारे कारोबार के लिए जगह दी जा रही है या वहां कारोबार हो रहा है तो व्यवस्थित वेंडिंग, यातायात और पैदल चलने वालों के लिए रास्ते की व्यवस्था कौन करेगा? शहर में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनती जिसमें विक्रेता भी सुरक्षित रहें और आम नागरिक का रास्ता भी सुरक्षित रहे?
अतिक्रमण हटता है, फिर लौटता कैसे है?
जिला प्रशासन समय-समय पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करता है। कार्रवाई के बाद कुछ दिनों तक सड़कें खुली नजर आती हैं। लेकिन फिर वही ठेले, दुकानें और कब्जे लौट आते हैं। अगर अतिक्रमण हटाने के बाद दोबारा उसी जगह कब्जा हो जाता है तो सवाल सिर्फ अतिक्रमण करने वाले से नहीं, निगरानी और व्यवस्था से भी पूछा जाना चाहिए। दस दिन कार्रवाई और ग्यारहवें दिन फिर वही तस्वीर—आखिर यह सिलसिला कब खत्म होगा? क्या अतिक्रमण हटाने का अभियान सिर्फ कुछ दिनों की राहत देने के लिए है या इसका उद्देश्य स्थायी समाधान भी है?
सभापति बदले, शहर की समस्या क्यों नहीं बदली?
खगड़िया नगर परिषद में समय-समय पर सभापति बदलते रहे, चेहरे बदलते रहे, कार्यकाल बदलते रहे, लेकिन शहर की बुनियादी समस्याओं को लेकर सवाल आज भी वही हैं। शहर में यह चर्चा और आरोप लंबे समय से सुनने को मिलता रहा है कि अलग-अलग कार्यकाल में रहे सभापतियों ने नगर परिषद के कामकाज में अपने और अपने करीबियों के हितों को प्राथमिकता दी। इन आरोपों को तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि जांच और सार्वजनिक जवाबदेही के सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए। आखिर नगर परिषद के अलग-अलग कार्यकाल में हुए विकास कार्यों, टेंडर, संवेदक चयन, भुगतान और राजस्व वसूली का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं परखा जाना चाहिए? किस काम का टेंडर किसे मिला? किस काम पर कितनी राशि खर्च हुई? किस संवेदक को कितना भुगतान हुआ? किन लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ मिला? इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड से मिलने चाहिए, आरोप-प्रत्यारोप से नहीं।
अपने लोगों को फायदा पहुंचाने के आरोप की जांच जरूरी
अगर किसी भी कार्यकाल में पद का इस्तेमाल निजी या करीबी लोगों के हित में किया गया, तो यह सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक धन और नगर प्रशासन की पारदर्शिता का सवाल बन जाता है। इसलिए नगर परिषद के पिछले वर्षों के टेंडर, वर्क ऑर्डर, भुगतान, संवेदक, वेंडिंग वसूली और विकास योजनाओं की स्वतंत्र जांच और सार्वजनिक ऑडिट की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। नगर परिषद जनता के पैसे से चलती है। इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसका पैसा कहां गया और किसे फायदा हुआ।
जलजमाव का इलाज पंप नहीं, स्थायी जलनिकासी है
हर बार पानी जमा होने के बाद पानी निकाल देना तत्काल राहत हो सकती है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। नगर परिषद को यह बताना चाहिए कि जलजमाव वाले इलाकों की पहचान क्या है, नालियों की क्षमता कितनी है, जलनिकासी का प्राकृतिक रास्ता कहां है और किन स्थानों पर अतिक्रमण या निर्माण के कारण पानी का बहाव बाधित है। अगर हर साल वही जगह डूबती है तो हर साल वही समस्या दोहराना व्यवस्था की सफलता नहीं, विफलता का प्रमाण है।
सोशल मीडिया के जिम्मेदार लोगों से भी सवाल
खगड़िया की समस्याओं पर सोशल मीडिया में आवाज उठाने वाले जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और जिम्मेदार नागरिक इस तस्वीर को सिर्फ शेयर करके अपनी जिम्मेदारी पूरी न समझें। सवाल उठाइए—नगर परिषद से जवाब मांगिए। राजस्व वसूली कितनी हुई? वेंडिंग की व्यवस्था कहां है? अतिक्रमण हटाने के बाद दोबारा कब्जा क्यों हुआ? जलनिकासी का स्थायी समाधान क्या है? पिछले वर्षों में विकास कार्यों पर कितना पैसा खर्च हुआ और किन संवेदकों को मिला? तस्वीर वायरल होना समाधान नहीं है। तस्वीर के पीछे छिपी जिम्मेदारी तय होना समाधान की शुरुआत है।
पत्रकारिता का सवाल साफ है
यह खबर किसी एक सभापति, अधिकारी या दुकानदार को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं है। सवाल पूरी व्यवस्था से है। जो भी व्यक्ति सार्वजनिक पद पर रहा, उससे उसके कार्यकाल का हिसाब पूछा जाना चाहिए। जो अधिकारी जिम्मेदार रहे, उनसे भी जवाब मांगा जाना चाहिए। और जहां अपने लोगों को फायदा पहुंचाने, नियमों को दरकिनार करने या सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के आरोप हैं, वहां दस्तावेजों के आधार पर जांच होनी चाहिए। नगर परिषद किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं, जनता की संस्था है।
आज की तस्वीर सबसे बड़ा सवाल
बलुआही की यह तस्वीर किसी राजनीतिक बयान से ज्यादा ताकतवर है। सड़क पर पानी खड़ा है, नागरिकों का रास्ता बाधित है और व्यवस्था से सवाल पूछे जा रहे हैं। जिस शहर में एक महिला को सामान्य रास्ते के बजाय दीवार के सहारे निकलना पड़े, वहां विकास के दावों की चमक से ज्यादा जरूरी है जमीनी हकीकत को देखना। जनता को दीवार फांदकर रास्ता नहीं बनाना है। जनता को अपनी सड़क पर चलने का अधिकार चाहिए।
नगर परिषद जवाब दे
नगर परिषद खगड़िया को अब सिर्फ कार्रवाई की तस्वीर नहीं, स्थायी समाधान का रोडमैप देना चाहिए। अतिक्रमण पर स्थायी नियंत्रण, व्यवस्थित वेंडिंग जोन, प्रभावी जलनिकासी और पिछले वर्षों के विकास कार्यों में पारदर्शिता—इन चारों सवालों का जवाब जनता को चाहिए। राजस्व की रसीद जनता से ली जाती है, तो सुविधा का हिसाब भी जनता को ही देना होगा।

