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बांकीपुर का फैसला, तीन चेहरों का भविष्य: सम्राट की ताकत, नीतीश की विरासत और प्रशांत का राजनीतिक अस्तित्व दांव पर

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पटना। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव को सिर्फ एक सीट की लड़ाई मानना बड़ी भूल होगी। यह चुनाव दरअसल बिहार की सत्ता के वर्तमान, अतीत और भविष्य के बीच सीधी टक्कर में बदल चुका है। एक तरफ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं, जिनके नेतृत्व में भाजपा पहली बार बिहार की सत्ता चला रही है। दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं, जिनकी दो दशक की राजनीति के बाद सत्ता का केंद्र बदला है। वहीं तीसरे मोर्चे पर प्रशांत किशोर हैं, जिनके लिए यह चुनाव राजनीतिक रणनीतिकार से जननेता बनने की पहली अग्निपरीक्षा है। प्रशांत किशोर पहले ही इस उपचुनाव को सम्राट चौधरी सरकार पर जनमत-संग्रह बता चुके हैं।

बांकीपुर की कहानी सिर्फ आज की नहीं है। कभी कांग्रेस के प्रभाव वाली यह सीट पिछले तीन दशकों में भाजपा के सबसे मजबूत शहरी गढ़ के रूप में उभरी। पार्टी के बड़े नेताओं ने यहां से अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की है। यही वजह है कि अभिषेक कुमार ‘बंटी’ की जगह नीरज सिन्हा को उतारने के फैसले को भाजपा का सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि “किसी भी कीमत पर किला बचाने” की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। प्रत्याशी बदलने के बाद विपक्ष को भाजपा पर हमले का मौका मिला है।

लेकिन इस चुनाव का सबसे बड़ा असर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर पड़ सकता है। अप्रैल 2026 में बिहार की कमान संभालने वाले सम्राट चौधरी के लिए यह पहला बड़ा चुनावी इम्तिहान है। अगर भाजपा बांकीपुर में आरामदायक जीत दर्ज करती है, तो पार्टी के भीतर उनका कद और मजबूत होगा। यह संदेश जाएगा कि भाजपा अब बिहार में केवल सहयोगी दल नहीं, बल्कि अपने दम पर राजनीतिक दिशा तय करने वाली ताकत बन चुकी है।

उधर, नीतीश कुमार भले ही मुख्यमंत्री पद छोड़कर दिल्ली की राजनीति में चले गए हों, लेकिन बांकीपुर का परिणाम उनके लिए भी कम अहम नहीं है। बीस वर्षों तक बिहार की राजनीति को अपने तरीके से चलाने वाले नीतीश के लिए यह चुनाव एनडीए के उस सामाजिक समीकरण की परीक्षा है, जिसे उन्होंने खड़ा किया था। अगर राजधानी की यह प्रतिष्ठित सीट एनडीए के हाथ से फिसलती है या मुकाबला उम्मीद से ज्यादा कठिन होता है, तो इसके राजनीतिक मायने दूर तक निकाले जाएंगे।

इसी बीच, प्रशांत किशोर ने बांकीपुर को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बना दिया है। वे लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि यह लड़ाई सिर्फ भाजपा और जन सुराज के बीच नहीं, बल्कि “पुरानी राजनीति बनाम नई राजनीति” की है। उन्होंने इस चुनाव को सम्राट चौधरी सरकार की लोकप्रियता की पहली परीक्षा बताया है।

दिलचस्प यह है कि बांकीपुर का यह उपचुनाव जिस दिन खत्म होगा, उसी दिन बिहार की राजनीति में कई सवालों के जवाब भी सामने आने लगेंगे—क्या सम्राट चौधरी भाजपा के निर्विवाद नेता बनकर उभरेंगे? क्या नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत अब भी उतनी ही मजबूत है? और क्या प्रशांत किशोर अपनी पहली चुनावी लड़ाई से बिहार की राजनीति का नया अध्याय लिख पाएंगे? यही वजह है कि 30 जुलाई का मतदान सिर्फ बांकीपुर का नहीं, बिहार के अगले राजनीतिक अध्याय का संकेत माना जा रहा है।

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