नई दिल्ली। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों में से एक है। जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी तक गांधी-नेहरू परिवार ने कांग्रेस की राजनीति को लंबे समय तक दिशा दी है। यही वजह है कि आज राहुल गांधी जब लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं, तो उनकी भूमिका का मूल्यांकन केवल आज के राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि कांग्रेस की पूरी राजनीतिक विरासत के संदर्भ में भी किया जाना स्वाभाविक है।
2026 के मानसून सत्र ने इस सवाल को और तीखा कर दिया है। संसद में लगातार व्यवधान के कारण हजारों मिनट का संसदीय समय प्रभावित हुआ। रिपोर्टों में करीब 7,023 मिनट के व्यवधान और लगभग ₹175.6 करोड़ की अनुमानित संचालन लागत का उल्लेख है। यह सरकारी खाते में दर्ज प्रत्यक्ष नुकसान नहीं, बल्कि बर्बाद संसदीय समय की अनुमानित कीमत है।
सवाल है—जिस संसद में देश की जनता अपने प्रतिनिधियों को भेजती है, क्या वहां सरकार को घेरने का सबसे प्रभावी तरीका सदन को ही बाधित करना है?
राहुल गांधी से सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि वे विपक्ष के नेता हैं
राहुल गांधी सामान्य सांसद नहीं हैं। वह लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। इस पद की जिम्मेदारी केवल सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार को संसद के भीतर जवाबदेह बनाना भी है।
सरकार के किसी फैसले से असहमति है तो सवाल पूछे जाएं। जवाब कमजोर है तो तथ्यों से काटा जाए। कानून गलत है तो संशोधन प्रस्ताव लाया जाए। सरकार जनता के हित में काम नहीं कर रही तो संसद के रिकॉर्ड पर उसकी जवाबदेही तय की जाए।
लेकिन यदि सदन ही बार-बार बाधित होगा तो विपक्ष सरकार से जवाब लेगा कैसे?
यही सवाल राहुल गांधी से है।
सोनिया गांधी और UPA का दौर भी भूलना आसान नहीं
राहुल गांधी जिस राजनीतिक विरासत के प्रतिनिधि हैं, उसके सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में 2004 से 2014 का UPA दौर भी है। इस दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे और सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष तथा UPA की चेयरपर्सन थीं।
इस दौर में 2G स्पेक्ट्रम, कोयला आवंटन और कॉमनवेल्थ गेम्स सहित कई बड़े भ्रष्टाचार विवादों ने तत्कालीन सरकार को घेरा। 2G मामले में CAG की रिपोर्ट ने संभावित राजस्व नुकसान का अनुमान लगाया था, जबकि बाद में विशेष अदालत ने 2017 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया; उस फैसले के खिलाफ CBI और ED की अपील दिल्ली हाईकोर्ट में स्वीकार हुई। इसलिए इसे न्यायिक रूप से अंतिम साबित “घोटाला” बताना सही नहीं होगा।
कोयला आवंटन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में 214 कोयला ब्लॉकों के आवंटन रद्द किए थे।
यानी कांग्रेस के उस दौर में भ्रष्टाचार और सरकारी संसाधनों के आवंटन को लेकर इतने बड़े सवाल उठे कि संसद से लेकर सड़क तक राजनीतिक बहस का केंद्र यही बन गया।
सवाल सोनिया गांधी से ज्यादा कांग्रेस की राजनीतिक जवाबदेही का
यहां एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—इन मामलों में हर आरोप का व्यक्तिगत जिम्मेदार सोनिया गांधी को ठहराना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल यह जरूर है कि जिस पार्टी और गठबंधन का नेतृत्व सोनिया गांधी कर रही थीं, उस सरकार के कार्यकाल में उठे इतने बड़े विवादों पर कांग्रेस ने राजनीतिक और नैतिक जवाबदेही किस तरह स्वीकार की?
यही सवाल आज राहुल गांधी की राजनीति के सामने भी खड़ा होता है।
कांग्रेस जब आज भ्रष्टाचार, संविधान और लोकतंत्र की बात करती है, तो जनता को उसके पुराने शासनकाल के विवादों का हिसाब पूछने का भी अधिकार है।
इंदिरा गांधी और आपातकाल का अध्याय भी इतिहास में है
कांग्रेस की लोकतंत्र संबंधी राजनीति पर चर्चा हो और 1975 का आपातकाल छोड़ दिया जाए, तो तस्वीर अधूरी रहेगी।
इंदिरा गांधी सरकार के आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध, प्रेस सेंसरशिप और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादित अध्याय है।
आज कांग्रेस संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की बात करती है तो सवाल यह भी है कि क्या लोकतंत्र की रक्षा केवल विरोधी सरकार के समय याद की जानी चाहिए, या अपने राजनीतिक इतिहास का आत्ममंथन भी उसी ईमानदारी से होना चाहिए?
राजीव गांधी से राहुल गांधी तक—पीढ़ी बदली, सवाल वही
राजीव गांधी के दौर में कांग्रेस को अभूतपूर्व बहुमत मिला। बाद के वर्षों में कांग्रेस ने सत्ता भी देखी और विपक्ष भी।
लेकिन आज राहुल गांधी के सामने परिस्थिति अलग है। वह विपक्ष के नेता हैं और उनके सामने देश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह सरकार के सामने एक तथ्य आधारित, नीतिगत और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करें।
सिर्फ मोदी सरकार का विरोध कांग्रेस को सत्ता का विकल्प नहीं बना सकता।
जनता को यह भी जानना होगा कि कांग्रेस सत्ता में आएगी तो करेगी क्या?
संसद रोकना विपक्ष की ताकत नहीं
मानसून सत्र में विपक्ष ने सरकार के सामने कई मुद्दे उठाए। लेकिन लगातार व्यवधान ने उसी विपक्ष की संसदीय ताकत को कमजोर किया।
राहुल गांधी से सवाल सीधा है—
अगर सरकार गलत है तो उसे संसद में बेनकाब कीजिए।
अगर सरकार झूठ बोल रही है तो आंकड़ों से साबित कीजिए।
अगर सरकार जवाब नहीं दे रही तो सदन के रिकॉर्ड पर सवाल रखिए।
और अगर सरकार जवाब देने को तैयार है तो उस जवाब को सुनकर उसे कठघरे में खड़ा कीजिए।
यही मजबूत विपक्ष की पहचान होगी।
जनता को इतिहास भी याद है और वर्तमान भी
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने अतीत से बचकर वर्तमान की राजनीति नहीं कर सकती।
नेहरू के लोकतांत्रिक प्रयोग, इंदिरा गांधी का आपातकाल, राजीव गांधी का दौर, सोनिया गांधी के नेतृत्व वाला UPA और आज राहुल गांधी का विपक्ष—यह सब कांग्रेस की राजनीतिक यात्रा के हिस्से हैं।
इसीलिए राहुल गांधी से सवाल केवल आज के मानसून सत्र का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने अतीत की गलतियों से सीखकर नई संसदीय संस्कृति बनाएगी?
देश को ऐसा विपक्ष चाहिए जो सरकार से कठिन सवाल पूछे।
देश को ऐसी सरकार चाहिए जो कठिन सवालों का जवाब दे।
लेकिन सबसे ऊपर देश को ऐसी संसद चाहिए जहां हंगामे से ज्यादा बहस और नारे से ज्यादा तथ्य की आवाज सुनाई दे।
अंतिम सवाल
राहुल गांधी के पास विपक्ष के नेता का पद है। यह पद उन्हें सरकार का विरोध करने का अधिकार देता है, लेकिन उससे बड़ी जिम्मेदारी देता है—सरकार को संसद के भीतर जवाबदेह बनाने की।
अब जनता को तय करना है कि वह किस तरह का विपक्ष चाहती है।
संसद रोकने वाला विपक्ष या संसद में सरकार को घेरने वाला विपक्ष?
क्योंकि लोकतंत्र में असली जीत सदन बंद कराने में नहीं—
सदन के भीतर जनता की आवाज बुलंद करने में है

