खगड़िया के रानीसकरपुरा स्थित अवध नारायण इंटर स्कूल का मामला; विभागीय दस्तावेजों में ₹72,58,256 की राशि का हिसाब जांच के घेरे में, प्रभारी प्रधानाध्यापक सूर्य नारायण यादव के निलंबन का आदेश जारी—लेकिन जांच की प्रगति, राशि की वसूली और अंतिम कार्रवाई पर जवाब अब भी जरूरी। जिला शिक्षा पदाधिकारी अमरेंद्र गोंड से NB18 के सीधे सवाल।
खगड़िया | NB18 की विशेष पड़ताल
सरकारी स्कूलों में आने वाली राशि बच्चों की पढ़ाई, विद्यालय के विकास और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए होती है। यह किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं और न ही किसी कर्मचारी को हिसाब से बचने की छूट है। जब एक विद्यालय से जुड़ी ₹72 लाख से अधिक की राशि के हिसाब पर सवाल उठते हैं, तो जनता को यह जानने का पूरा हक है कि जांच में क्या सामने आया, जिम्मेदारी किसकी तय हुई और कार्रवाई कहां तक पहुंची।
खगड़िया जिले के रानीसकरपुरा स्थित अवध नारायण इंटर स्कूल से जुड़ा मामला अब केवल एक शिक्षक के निलंबन तक सीमित सवाल नहीं है। यह शिक्षा विभाग की निगरानी, विभागीय जांच की गति और सरकारी धन के हिसाब की पारदर्शिता का भी सवाल है।
उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों में कुल ₹72,58,256 की राशि का उल्लेख है। संबंधित शिक्षक सूर्य नारायण यादव, जो विद्यालय में सहायक शिक्षक और प्रभारी प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी निभा रहे थे, को 10 फरवरी 2026 के शिक्षा विभागीय आदेश के अनुसार निलंबित कर विभागीय कार्यवाही शुरू करने की बात दर्ज है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल है—निलंबन के बाद आगे क्या हुआ? जांच की मौजूदा स्थिति क्या है? राशि का हिसाब कहां तक पहुंचा? और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया किस स्तर पर लंबित है?
NB18 इन सवालों का जवाब मांगेगा। दस्तावेजों से जो साबित होगा, वही प्रकाशित होगा; लेकिन सवालों को दबाने या जवाबदेही से बचने की कोई कोशिश स्वीकार नहीं की जाएगी।
₹72.58 लाख का हिसाब: विभाग जनता को पूरी तस्वीर कब दिखाएगा?
उपलब्ध दस्तावेजों में राशि का विवरण इस प्रकार सामने आता है:
- उच्च माध्यमिक स्तर से संबंधित राशि: ₹52,75,480
- माध्यमिक स्तर से संबंधित राशि: ₹19,82,776
- कुल राशि: ₹72,58,256
दस्तावेजों में खर्च से संबंधित लगभग ₹5,73,700 की रसीदों को लेकर भी सवाल दर्ज होने की जानकारी है। बैंक खातों के विवरण और भुगतान से संबंधित बिंदुओं की जांच का संदर्भ भी सामने आया है।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि कुल राशि का उल्लेख अपने आप में उतनी ही राशि के गबन का अंतिम प्रमाण नहीं है। वास्तविक वित्तीय अनियमितता, स्वीकार्य खर्च, उपलब्ध रसीदें, बैंक लेन-देन और किसी संभावित नुकसान का निर्धारण जांच के रिकॉर्ड से ही होगा।
लेकिन यदि विभाग ने जांच की है, तो वह अब तक के निष्कर्षों को स्पष्ट क्यों नहीं करता? कितनी राशि का हिसाब स्वीकार किया गया? कितनी राशि पर आपत्ति है? क्या किसी वित्तीय नुकसान का निर्धारण हुआ? क्या वसूली की प्रक्रिया शुरू की गई?
ये सवाल किसी व्यक्ति को पहले से दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि सरकारी धन का हिसाब मांगने के लिए हैं।
जिला शिक्षा पदाधिकारी अमरेंद्र गोंड से सवाल: पत्रकार फोन करे तो परेशानी क्यों?
इस मामले में जिला शिक्षा पदाधिकारी अमरेंद्र गोंड से फोन पर संपर्क के दौरान, पत्रकार के अनुसार, पहले रविवार को फोन करने पर आपत्ति जताई गई। इसके बाद कथित तौर पर कहा गया—“हमेशा घोटाला क्यों ढूंढ़ते हैं।”
यदि बातचीत में यही शब्द कहे गए, तो यह जवाबदेही के लिहाज से गंभीर सवाल पैदा करता है। पत्रकार का काम सरकारी रिकॉर्ड, विभागीय कार्रवाई और जनहित से जुड़े मामलों पर सवाल पूछना है। अधिकारी व्यस्त हो सकते हैं, तत्काल जवाब देने की स्थिति में नहीं हो सकते, लेकिन सवालों का तथ्यात्मक जवाब देने के लिए उचित माध्यम और समय बताना भी प्रशासनिक संवाद का हिस्सा है।
जिला शिक्षा पदाधिकारी अमरेंद्र गोंड के लिए NB18 का स्पष्ट संदेश है: खबर की सत्यता जांचने और संबंधित पक्ष का जवाब लेने के लिए NB18 रविवार को ही नहीं, किसी भी दिन उनके सरकारी नंबर पर संपर्क करेगा।
पत्रकारिता में सवाल पूछने का दिन तय नहीं होता। सवाल तथ्यों पर आधारित हों, तो उनका जवाब भी तथ्यों से ही दिया जाना चाहिए। यदि विभाग के पास दस्तावेज हैं जो आरोपों का खंडन करते हैं, जांच में हिसाब संतोषजनक मिला है या कार्रवाई नियमानुसार आगे बढ़ रही है, तो NB18 विभाग का पक्ष भी प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।
लेकिन “आप हमेशा घोटाला क्यों ढूंढ़ते हैं” जैसे कथित जवाब से न तो राशि का हिसाब मिलता है, न जांच की स्थिति स्पष्ट होती है और न जनता की शंका दूर होती है।
अमरेंद्र गोंड बताएं—जांच की वास्तविक स्थिति क्या है? आरोपपत्र कब जारी हुआ? जांच रिपोर्ट तैयार हुई या नहीं? और यदि मामला लंबित है, तो उसकी वजह क्या है?
निलंबन आदेश जारी हुआ—क्या उसके बाद विभाग ने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली?
10 फरवरी 2026 के शिक्षा विभागीय आदेश में सूर्य नारायण यादव के निलंबन और विभागीय कार्यवाही का उल्लेख है। आदेश में बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 9(1) का संदर्भ दिया गया है।
यह आदेश अपने आप में अंतिम दोषसिद्धि नहीं है। निलंबन का अर्थ यह भी नहीं कि संबंधित कर्मचारी को बिना जांच नौकरी से हटाया जा सकता है। लेकिन निलंबन के बाद विभाग की जिम्मेदारी खत्म भी नहीं हो जाती।
अब जनता को यह जानना है कि आरोपपत्र कब जारी हुआ, संबंधित कर्मचारी से जवाब लिया गया या नहीं, जांच पदाधिकारी ने क्या कार्रवाई की, जांच रिपोर्ट बनी या नहीं और सक्षम प्राधिकारी ने कोई अंतिम निर्णय लिया है या नहीं।
यदि वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है, तो लागू सेवा नियमों के अनुसार दंड और वसूली पर निर्णय होना चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो संबंधित कर्मचारी को निष्पक्ष निर्णय मिलना चाहिए। दोनों ही स्थितियों में जरूरी है कि जांच अनिश्चितकाल तक सवालों के घेरे में न लटकी रहे।
NB18 का सवाल है—क्या विभाग केवल निलंबन आदेश जारी कर मामले को ठंडे बस्ते में छोड़ देगा, या जांच और अंतिम निर्णय की स्थिति भी जनता के सामने रखेगा?
आधी सैलरी पर सवाल, लेकिन नियमों की सही स्थिति भी जरूरी
निलंबन के दौरान सरकारी सेवक को नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता मिल सकता है। इसलिए निलंबित कर्मचारी को आधा वेतन या जीवन निर्वाह भत्ता मिलना अपने आप में उसे बचाने का प्रमाण नहीं है।
असल सवाल यह है कि क्या विभाग लागू नियमों के अनुसार जांच पूरी कर रहा है? क्या निर्धारित प्रक्रिया और समयसीमा का पालन हुआ? क्या किसी देरी का कारण रिकॉर्ड पर दर्ज है? क्या वित्तीय नुकसान का निर्धारण हुआ और यदि हुआ, तो वसूली या अन्य कार्रवाई पर निर्णय लिया गया?
बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 9 और नियम 10 निलंबन तथा जीवन निर्वाह भत्ते से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान रखते हैं। इनका इस मामले में सही अनुप्रयोग संबंधित आदेशों, लागू संशोधनों और विभागीय रिकॉर्ड को देखकर ही तय किया जा सकता है।
इसलिए शिक्षा विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि 10 फरवरी 2026 के आदेश के बाद प्रक्रिया किस चरण में है और यदि जांच में देरी हुई है, तो उसके कारण क्या हैं।
सवाल आधी सैलरी का नहीं, सवाल यह है कि सरकारी नियमों के तहत जांच और निर्णय समय पर हो रहे हैं या नहीं।
डीएम विक्रम विरकर से भी जवाब की अपेक्षा
मामले को लेकर जिलाधिकारी विक्रम विरकर से भी फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन कॉल का जवाब नहीं मिला। केवल कॉल का जवाब नहीं मिलने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जिलाधिकारी ने जानबूझकर बात नहीं की।
फिर भी जिला प्रशासन से अपेक्षा है कि वह मामले की मौजूदा स्थिति स्पष्ट करने में मदद करे। क्या वित्तीय रिकॉर्ड की जांच पूरी हुई? क्या संबंधित विभाग से प्रगति रिपोर्ट मांगी गई? क्या किसी संभावित वित्तीय नुकसान का निर्धारण हुआ? क्या जांच की निगरानी की जा रही है?
यदि जिला प्रशासन के पास इन सवालों के जवाब हैं, तो उन्हें दस्तावेजों के साथ सामने आना चाहिए। जनता को सिर्फ आदेशों की तारीख नहीं, कार्रवाई की वास्तविक स्थिति भी जाननी चाहिए।
NB18 के 12 सवाल—जवाब कौन देगा?
- ₹72,58,256 की राशि के संबंध में विभागीय जांच का वर्तमान निष्कर्ष क्या है?
- कितनी राशि का हिसाब स्वीकार किया गया और कितनी राशि पर आपत्ति कायम है?
- लगभग ₹5,73,700 के खर्च की रसीदों पर उठे सवालों की जांच कहां तक पहुंची?
- संबंधित बैंक खातों के सभी विवरण और लेन-देन की जांच पूरी हुई या नहीं?
- क्या किसी सत्यापित वित्तीय नुकसान का निर्धारण किया गया है? यदि हां, तो कितना?
- 10 फरवरी 2026 के निलंबन आदेश के बाद आरोपपत्र कब जारी हुआ?
- विभागीय जांच की मौजूदा स्थिति क्या है और जांच रिपोर्ट तैयार हुई या नहीं?
- यदि जांच में देरी हुई, तो उसका कारण क्या है और क्या वह रिकॉर्ड पर दर्ज है?
- क्या किसी राशि की वसूली की प्रक्रिया शुरू की गई है?
- यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो लागू नियमों के तहत अंतिम दंड तय करने की प्रक्रिया कब तक पूरी होगी?
- जिला शिक्षा पदाधिकारी अमरेंद्र गोंड मामले की वर्तमान स्थिति और विभागीय कार्रवाई का विवरण देने के लिए तैयार हैं?
- जिलाधिकारी कार्यालय इस मामले की प्रगति पर क्या जानकारी उपलब्ध करा सकता है?
NB18 की दो टूक: सवालों का जवाब दीजिए, आरोपों का फैसला जांच से होने दीजिए
NB18 किसी व्यक्ति को जांच पूरी होने से पहले दोषी घोषित नहीं कर रहा। लेकिन ₹72 लाख से अधिक की राशि के हिसाब पर सवाल हों और निलंबन के बाद की कार्रवाई की स्थिति जनता को स्पष्ट न हो, तो सवाल उठाना जरूरी है।
यदि संबंधित शिक्षक के पास खर्च का वैध हिसाब, स्वीकृतियां और दस्तावेज हैं, तो उन्हें जांच में प्रस्तुत करने और अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। यदि विभाग ने जांच में कोई अनियमितता नहीं पाई है, तो वह निष्कर्ष सार्वजनिक करे। और यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित नियमों के अनुसार कार्रवाई तथा वसूली की स्थिति स्पष्ट करे।
जिला शिक्षा विभाग को यह बताना होगा कि मामला किस स्तर पर है, जांच में क्या सामने आया और आगे की कार्रवाई कब तक होगी।
पत्रकार से यह पूछना कि वह सवाल क्यों ढूंढ़ता है, सरकारी धन का हिसाब नहीं है। सवालों का जवाब रिकॉर्ड से दीजिए। जांच की स्थिति बताइए। जनता को भ्रम में मत रखिए।
NB18 की पत्रकारिता का आधार स्पष्ट है—दस्तावेज, तथ्य और जवाबदेही। अधिकारी का पद सवालों से ऊपर नहीं है।
