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‘आप वर्दी में हैं, इसलिए इज्जत कर रहा हूं… नहीं तो क्या?’ फिर आम महिला की इज्जत कौन करेगा?

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खगड़िया की महिला पुलिसकर्मी के साथ कथित बदसलूकी ने पत्रकारिता की गरिमा, महिला सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी पर खड़े किए गंभीर सवाल। कैमरा हाथ में होने से कोई पत्रकार नहीं बन जाता और वर्दी में होने से ही कोई महिला सम्मान की हकदार नहीं होती।

खगड़िया। कुछ शब्द केवल कानों तक नहीं पहुंचते, वे समाज की सोच को भी बेनकाब कर देते हैं। खगड़िया में एक महिला पुलिसकर्मी और खुद को पत्रकार एवं यूट्यूबर बताने वाले व्यक्ति के बीच हुई घटना में सामने आया कथित वाक्य कुछ ऐसा ही है— ‘आप वर्दी में हैं, इसलिए इज्जत कर रहा हूं… नहीं तो क्या?’

इस एक वाक्य ने मेरे सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सम्मान का आधार क्या है? किसी महिला की वर्दी, उसका पद, उसकी सामाजिक हैसियत या उसका इंसान होना?

अगर सामने वर्दी में खड़ी महिला पुलिसकर्मी नहीं, बल्कि कोई आम महिला होती तो क्या व्यवहार यही रहता? क्या उसकी बात सुनने की शालीनता दिखाई जाती? क्या उसके आत्मसम्मान का ख्याल रखा जाता? या फिर वर्दी और पद का दबाव नहीं होने पर व्यवहार की मर्यादा भी समाप्त हो जाती?

यह सवाल केवल उस व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस पूरी मानसिकता से है जो महिला के सम्मान को उसकी ताकत और हैसियत से जोड़कर देखती है।

महिला का सम्मान किसी वर्दी का मोहताज नहीं होता।

ड्यूटी कर रही महिला पुलिसकर्मी से बदसलूकी आखिर किस अधिकार से?

एक महिला पुलिसकर्मी सड़क पर खड़ी होकर अपनी ड्यूटी निभाती है। यातायात नियंत्रित करना, नियमों का पालन कराना और आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी है। उसके किसी फैसले पर असहमति हो सकती है। कोई नागरिक सवाल पूछ सकता है और अपनी शिकायत भी दर्ज करा सकता है। लेकिन असहमति का मतलब अभद्रता करने का अधिकार नहीं है।

वर्दी पहनने वाली महिला भी किसी परिवार की बेटी, बहन, पत्नी और मां होती है। वह भी सम्मान और गरिमा के साथ काम करने का अधिकार रखती है। उसे अपनी ड्यूटी निभाने के दौरान किसी के अहंकार या कथित दबंगई का सामना क्यों करना पड़े?

खगड़िया की इस घटना में महिला पुलिसकर्मी का पक्ष सामने आया है। वायरल वीडियो और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। संबंधित व्यक्ति को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन महिला सम्मान के सवाल को किसी व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं किया जा सकता।

पत्रकारिता के नाम पर यह तमाशा कब तक?

पत्रकारिता आज एक गंभीर चुनौती से गुजर रही है। एक तरफ ऐसे पत्रकार हैं जो वर्षों तक संघर्ष करके अपनी पहचान बनाते हैं, जोखिम उठाते हैं, तथ्यों की पड़ताल करते हैं और समाज के सामने सच लाने का प्रयास करते हैं। दूसरी तरफ कुछ ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं जिनके लिए मोबाइल कैमरा, सोशल मीडिया अकाउंट और यूट्यूब चैनल ही पत्रकार होने का प्रमाण बन गए हैं।

सवाल पूछना पत्रकारिता है, लेकिन सवाल के नाम पर किसी को अपमानित करना पत्रकारिता नहीं। सत्ता से टकराना पत्रकारिता है, लेकिन अपनी कथित पहुंच का डर दिखाना पत्रकारिता नहीं। जनता की आवाज बनना पत्रकारिता है, लेकिन जनता के सामने ही किसी की गरिमा को चोट पहुंचाना पत्रकारिता कैसे हो सकता है?

आज स्थिति यह हो गई है कि जिसे खबर लिखने का एक कॉलम तैयार करने का अनुभव नहीं, जिसे तथ्यों और आरोपों के बीच का अंतर समझने की जरूरत है, वह भी पत्रकारिता का तमगा लेकर घूम रहा है।

पत्रकारिता कोई ऐसा पेशा नहीं है जिसमें केवल माइक पकड़ लेने से जिम्मेदारी पूरी हो जाती है। इसके लिए अध्ययन, भाषा, संवैधानिक समझ, निष्पक्षता और सबसे महत्वपूर्ण आत्मानुशासन चाहिए।

कैमरा हाथ में होना और पत्रकार होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

ऐसे गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के कारण समाज में पत्रकारिता का मजाक बनता है। जब कोई व्यक्ति पत्रकारिता की आड़ में अभद्रता करता है तो सवाल केवल उसके व्यक्तिगत आचरण पर नहीं उठता, बल्कि उन सभी ईमानदार पत्रकारों की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है जो इस पेशे को सम्मान दिलाने के लिए लगातार काम कर रहे हैं।

खगड़िया की बहादुर बेटी के साथ समाज खड़ा हो

इस पूरे मामले में महिला पुलिसकर्मी का साहस भी चर्चा के योग्य है। अपने साथ हुए घटनाक्रम को सामने लाकर उन्होंने एक महत्वपूर्ण सामाजिक सवाल उठाया है। उन्हें यह भरोसा मिलना चाहिए कि वर्दी में हों या बिना वर्दी के, किसी भी महिला के सम्मान के साथ समझौता नहीं किया जा सकता।

मैं खगड़िया की उस महिला पुलिसकर्मी के प्रति सम्मान व्यक्त करता हूं जो अपनी ड्यूटी के दौरान ऐसी स्थिति का सामना करने के बावजूद अपने पक्ष को सामने रखने का साहस दिखा रही हैं।

यह किसी पुलिसकर्मी बनाम यूट्यूबर की लड़ाई नहीं होनी चाहिए। यह महिला सम्मान और जिम्मेदार सार्वजनिक व्यवहार का सवाल है।

नए एसपी और जिलाधिकारी को समझनी होगी जिम्मेदारी

खगड़िया के नए पुलिस अधीक्षक और वर्तमान जिलाधिकारी के सामने भी यह एक महत्वपूर्ण संदेश है। प्रशासन को वास्तविक पत्रकारों और पत्रकारिता के नाम पर अपनी धौंस जमाने वाले लोगों के बीच अंतर समझना होगा।

पत्रकार और प्रशासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां हैं। पत्रकार का काम प्रशासन से सवाल पूछना है और प्रशासन का काम जवाबदेह रहना है। लेकिन इस संबंध में सम्मान, मर्यादा और निष्पक्षता अनिवार्य है।

अधिकारियों को भी यह देखना चाहिए कि वे किन लोगों को महत्व दे रहे हैं और किस तरह के आचरण को अनजाने में प्रोत्साहित कर रहे हैं। यदि किसी अधिकारी द्वारा अनुचित व्यवहार करने वाले व्यक्ति को संरक्षण या विशेष महत्व दिया जाता है, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

प्रशासन को इस मामले में किसी दबाव या पहचान से प्रभावित हुए बिना निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी चाहिए। दोष साबित होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

पत्रकारिता का बहिष्कार नहीं, पत्रकारिता के नाम पर बदसलूकी का बहिष्कार हो

मैं मानता हूं कि पत्रकारिता के नाम पर महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले और अपने कैमरे की आड़ में दूसरों को अपमानित करने वाले लोगों को जिम्मेदार पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थानों में जगह नहीं मिलनी चाहिए। उनके ऐसे आचरण का सामाजिक और पेशेवर स्तर पर विरोध होना चाहिए।

हालांकि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ फैसला जांच और तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। लेकिन गलत व्यवहार को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि संबंधित व्यक्ति अपने नाम के आगे पत्रकार या यूट्यूबर लिखता है।

मैंने पत्रकारिता को हमेशा समाज के प्रति जवाबदेही के रूप में देखा है। पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका कैमरा नहीं, उसकी विश्वसनीयता होती है। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी आवाज नहीं, उसकी कलम होती है। और उसका सबसे बड़ा सम्मान जनता का भरोसा होता है।

अंत में कुछ सवाल, जिनका जवाब समाज को भी देना होगा

उस कथित टिप्पणी करने वाले व्यक्ति से मेरा एक सीधा सवाल है—अगर सामने वर्दी में महिला पुलिसकर्मी नहीं होतीं, तो क्या आप उनका सम्मान करते?

अगर सामने कोई ऐसी महिला होती जिसके पास न वर्दी होती, न सरकारी पद और न ही किसी अधिकारी तक पहुंच, तो क्या उसके आत्मसम्मान की भी उतनी ही कीमत होती?

और अगर किसी महिला का सम्मान केवल उसकी वर्दी देखकर किया जाता है, तो फिर समाज में इंसानियत और संस्कार का अर्थ क्या रह जाता है?

याद रखिए, वर्दी कानून की पहचान है, लेकिन महिला का सम्मान उसका मौलिक अधिकार और हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है।

पत्रकारिता का काम कमजोर को और कमजोर करना नहीं, उसे आवाज देना है। पत्रकारिता का काम किसी को डराना नहीं, सच के सामने ताकतवर को भी जवाबदेह बनाना है।

मैं उस पत्रकारिता के साथ हूं जो अन्याय के खिलाफ खड़ी होती है, जो महिलाओं की गरिमा की रक्षा करती है और जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखती है।

लेकिन पत्रकारिता के नाम पर किसी की इज्जत से खेलने वालों के साथ मेरी कोई सहमति नहीं हो सकती।

क्योंकि कैमरा लेकर किसी को अपमानित करना आसान है, लेकिन कलम से समाज का सम्मान अर्जित करना बहुत कठिन।

पत्रकारिता धौंस का नहीं, जिम्मेदारी का नाम है। और महिला सम्मान कोई विकल्प नहीं, सभ्य समाज की पहचान है।

— अभिजीत सिन्हा

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